शिमला/रामपुर बुशहर। हिमाचल प्रदेश की सियासत में सराहन  jfookj को सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक संदेशों का मंच भी बन गया। आठवें नवरात्र के अवसर पर मां भीमाकाली की नगरी सराहन में छह बार के मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह की प्रतिमा का अनावरण हुआ, तो इसे देखने के लिए कांग्रेस के कई बड़े चेहरे एक मंच पर नजर आए। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री राजा वीरभद्र सिंह के प्रतिमा अनावरण समारोह ने हिमाचल की पूरी सियासी चाल को ही नए सिरे से परिभाषित कर दिया है।

 

यह भी पढ़ें : नवरात्र में मातम: शीतला माता मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं को ट्रक ने कु..चला, 14 की मौ**त- 32 घायल

 

इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भले ही सत्ता की कमान आज किसी और के हाथ में हो, लेकिन हिमाचल कांग्रेस की धड़कनों में राजा वीरभद्र सिंह का जलवा आज भी पूरी ताकत के साथ जीवंत है। इस कार्यक्रम में कांग्रेस के कई दिग्गजों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार, मंत्री विक्रमादित्य सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, कुलदीप सिंह राठौर और वरिष्ठ नेता रामलाल ठाकुर सहित कई नेताओं की मौजूदगी ने इस आयोजन का राजनीतिक महत्व बढ़ा दिया।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल : आधी रात घर में पड़ी पुलिस रेड, 28 वर्षीय महिला से मिला लाखों का चिट्टा


वीरभद्र सिंह की जन्मभूमि पर उनकी प्रतिमा के सामने कांग्रेस के दिग्गजों का जुटना ऐसे समय में हुआ है, जब पार्टी के भीतर उनकी विरासत, सम्मान और राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस फिर तेज हुई है। करीब दस दिन पहले रोहड़ू और रामपुर में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के कार्यक्रमों के पोस्टर-बैनर में वीरभद्र सिंह की तस्वीर नजर नहीं आने पर सवाल उठे थे। उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह ने इस पर नाराजगी जताई थी। अब सराहन में बड़े नेताओं की मौजूदगी ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि हिमाचल कांग्रेस की राजनीति में राजा वीरभद्र सिंह की विरासत की अहमियत आज भी कितनी गहरी है।

 

यह भी पढ़ें : आज सराहन में होगा राजा वीरभद्र की प्रतिमा का अनावरण, कांग्रेस के कई दिग्गज नेता होंगे शामिल

सराहन में प्रतिमा अनावरण दे गया कई सियासी संदेश

सराहन में प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम धार्मिक और भावनात्मक महत्व से जुड़ा रहा, लेकिन इसकी राजनीतिक टाइमिंग ने इसे और चर्चा में ला दिया। वीरभद्र सिंह हिमाचल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे। छह बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई और कांग्रेस संगठन में उनका मजबूत प्रभाव रहा।

 

उनके निधन के बाद भी उनका नाम और राजनीतिक विरासत प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में उनकी जन्मभूमि पर प्रतिमा का अनावरण और कांग्रेस के अलग-अलग दौर के नेताओं का एक साथ दिखाई देना महज औपचारिक कार्यक्रम से आगे का दृश्य बन गया।

विक्रमादित्य सिंह ने प्रतिमा स्थापना के बताए थे दो कारण

मंत्री विक्रमादित्य सिंह के मुताबिक, सराहन में प्रतिमा स्थापित करने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, यह वीरभद्र सिंह की जन्मभूमि है और दूसरा, मां भीमाकाली के प्रति उनकी गहरी आस्था रही थी। प्रतिमा मां भीमाकाली मंदिर के समीप स्थापित की गई है। इसे जनभावनाओं से जोड़ने के लिए रामपुर उपमंडल की 54 पंचायतों से मिट्टी भी एकत्र की गई।

दस दिन पहले तस्वीर पर उठे थे सवाल

अक्टूबर की शुरुआत में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू रोहड़ू और रामपुर के दौरे पर थे। रोहड़ू से वीरभद्र सिंह पांच बार विधायक चुने गए थे और रामपुर-बुशहर क्षेत्र उनकी राजनीति का मजबूत आधार रहा। लेकिन मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों से जुड़े पोस्टर और बैनर में उनकी तस्वीर दिखाई नहीं दी। इसके बाद पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने सवाल उठाया कि वीरभद्र सिंह के योगदान को इतनी जल्दी कैसे भुलाया जा सकता है।

यह भी पढ़ें : सुक्खू सरकार का बड़ा कदम: महिलाओं को 1500 रुपए-300 यूनिट फ्री बिजली योजना में जुड़ेगे कई और नाम 

उन्होंने कहा था कि यदि आयोजकों ने पोस्टर नहीं लगाए, तो स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता भी उनके पोस्टर और बैनर लगा सकते थे। मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार ने भी कहा था कि तस्वीर नहीं लगनी चाहिए थी, ऐसा नहीं होना चाहिए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री सुक्खू की ओर से इस विवाद पर सार्वजनिक तौर पर कोई सीधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

 

सुक्खू और वीरभद्र परिवार के बीच पुराने समीकरणों की चर्चा

हिमाचल कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन को लेकर अलग-अलग धड़ों की चर्चा नई नहीं है। वीरभद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी की राजनीति में नए समीकरण उभरे। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सुखविंदर सिंह सुक्खू को मिली। उस समय प्रतिभा सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं और विक्रमादित्य सिंह विधायक थे।

वीरभद्र और सीएम सुक्खू के पुराने मतभेद

सुक्खू और वीरभद्र सिंह के बीच संगठन तथा नेतृत्व को लेकर पुराने मतभेदों की चर्चा भी होती रही है। सरकार बनने के बाद समय-समय पर पार्टी के भीतर असंतोष सार्वजनिक रूप से सामने आया। फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के छह विधायकों की क्रॉस वोटिंग और कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की हार ने इस खींचतान को खुलकर सामने ला दिया। भाजपा के उम्मीदवार हर्ष महाजन चुनाव जीत गए, जो कभी वीरभद्र सिंह के करीबी माने जाते थे और 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल से 3 करोड़ की चरस लेकर दिल्ली में सप्लाई करने निकले दो युवक, बीच रास्ते बड़ी खेप संग धरे

विक्रमादित्य ने दिया था मंत्री पद से इस्तीफा

इसी राजनीतिक संकट के दौरान विक्रमादित्य सिंह ने भी मंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया था। उन्होंने विधायकों की अनदेखी और अपने पिता के सम्मान से जुड़े मुद्दे उठाए थे। बाद में कांग्रेस हाईकमान की दखल के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। इस घटनाक्रम ने दिखाया कि वीरभद्र सिंह की विरासत और परिवार की राजनीतिक भूमिका का प्रश्न कांग्रेस के भीतर अब भी संवेदनशील बना हुआ है।

वीरभद्र सिंह का नाम आज भी कांग्रेस की राजनीति में प्रभावशाली

सराहन में प्रतिमा अनावरण के मौके पर उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार, प्रतिभा सिंह, विक्रमादित्य सिंह, कुलदीप सिंह राठौर और रामलाल ठाकुर जैसे नेताओं की मौजूदगी ने आयोजन को व्यापक राजनीतिक स्वरूप दिया। इन नेताओं के राजनीतिक अनुभव और पार्टी में अलग-अलग दौर की भूमिकाओं के चलते कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति को खास नजर से देखा गया। वीरभद्र सिंह के साथ कई वरिष्ठ नेताओं के लंबे राजनीतिक संबंध रहे हैं। वहीं, रामपुर-बुशहर और शिमला के कई क्षेत्रों में उनका दशकों पुराना जनसंपर्क और राजनीतिक आधार रहा है।

क्या कांग्रेस के भीतर गुटबाजी खत्म हुई?

सराहन में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का एक साथ दिखाई देना निश्चित रूप से चर्चा का विषय है, लेकिन इससे पार्टी के भीतर चल रहे मतभेद समाप्त हो गए हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। राजनीति में एक मंच पर मौजूदगी और संगठन के भीतर सहमति दो अलग बातें हैं। वीरभद्र सिंह की तस्वीर को लेकर उठा विवाद और उसके बाद सराहन में हुआ भव्य आयोजन इस बात को जरूर रेखांकित करता है कि उनकी विरासत कांग्रेस के लिए भावनात्मक होने के साथ-साथ राजनीतिक महत्व भी रखती है।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल पुलिस का जवान शहीद: ट्रैफिक कंट्रोल करते दो बसों के बीच फंसा SI राजेश, थम गईं सांसे

 

एक ओर मुख्यमंत्री सुक्खू के नेतृत्व में वर्तमान सरकार और संगठन आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर वीरभद्र सिंह का नाम, उनके समर्थकों का आधार और परिवार की राजनीतिक भूमिका अब भी चर्चा में है। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती यह भी है कि वह अपनी ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत और वर्तमान नेतृत्व के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।

2027 के चुनाव से पहले विरासत की राजनीति अहम

हिमाचल प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वीरभद्र सिंह की विरासत को लेकर होने वाली चर्चाएं आगे भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रह सकती हैं। उनके नाम से जुड़ा राजनीतिक इतिहास, रामपुर-बुशहर क्षेत्र में उनका प्रभाव और कांग्रेस की कई पीढ़ियों के नेताओं के साथ उनके संबंध आज भी प्रासंगिक हैं। सराहन में प्रतिमा अनावरण के दौरान कांग्रेस के दिग्गजों की मौजूदगी ने यह संदेश जरूर दिया कि वीरभद्र सिंह का राजनीतिक प्रभाव उनकी मृत्यु के बाद भी सार्वजनिक स्मृति से मिटा नहीं है। दस दिन पहले उनकी तस्वीर को लेकर सवाल उठे थे और अब उनकी जन्मभूमि पर प्रतिमा के सामने कई बड़े नेता एक साथ खड़े दिखाई दिए।

 

राजा वीरभद्र सिंह का दौर भले ही समाप्त हो चुका है, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत की कहानी हिमाचल में अभी खत्म नहीं हुई है। सराहन में आस्था के बीच उभरी यह सियासी तस्वीर आने वाले समय में कांग्रेस की राजनीति, उसके आंतरिक समीकरणों और 2027 के चुनाव से पहले विरासत के सवाल को फिर चर्चा में रख सकती है।

नोट : ऐसी ही तेज़, सटीक और ज़मीनी खबरों से जुड़े रहने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर हमारे फेसबुक पेज को फॉलो करें