शिमला। हिमाचल प्रदेश से नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद अनुराग शर्मा की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उनके चुनाव को चुनौती देने वाली एक याचिका पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में भारत निर्वाचन आयोग (ECI), केंद्र और राज्य सरकार, रिटर्निंग ऑफिसर और स्वयं अनुराग शर्मा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

क्या है पूरा विवाद ?

हाईकोर्ट के अधिवक्ता विनय शर्मा ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर आरोप लगाया है कि अनुराग शर्मा ने जब राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन भरा था, तब वे सरकारी ठेकेदार के रूप में सक्रिय थे। कानून के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति चुनाव लड़ते समय सरकार के साथ किसी सक्रिय बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट में शामिल है तो वो चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाता है।

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हाईकोर्ट का आदेश और मुख्य आरोप

चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बीसी नेगी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सभी पक्षों को 21 मई 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया है। याचिका में मुख्य रूप से ये बिंदु उठाए गए हैं:

  • सक्रिय ठेके: आरोप है कि नामांकन के समय अनुराग शर्मा के 7 सरकारी ठेके चल रहे थे। 
  • कानून का उल्लंघन: 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951' की धारा 9A कहती है कि सरकारी कॉन्ट्रैक्ट होने पर प्रत्याशी अयोग्य हो जाता है।
  • करोड़ों के काम: अनुराग शर्मा ने खुद अपने हलफनामे में 23.64 करोड़ के सरकारी ठेके दर्शाए हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि इसमें से करीब 12.58 करोड़ के दो काम तो चुनाव से ठीक पहले 19 फरवरी 2026 को ही उन्हें मिले थे।
  • रिटर्निंग ऑफिसर पर सवाल: याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव अधिकारी ने इन तथ्यों की ठीक से जांच किए बिना ही नामांकन स्वीकार कर लिया जो कि गलत है।

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आगे क्या होगा ?

अगर हाईकोर्ट में ये साबित हो जाता है कि नामांकन के वक्त उनके पास सक्रिय सरकारी कॉन्ट्रैक्ट थे तो उनका चुनाव अवैध घोषित किया जा सकता है। इसका मतलब है कि उनकी सांसद की सदस्यता रद्द हो सकती है। फिलहाल अब सबकी नजरें 21 मई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं जहां चुनाव आयोग और अनुराग शर्मा को अपनी सफाई पेश करनी होगी।