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March 25, 2026

सुक्खू सरकार ने 3 साल में खड़ा किया कर्ज का पहाड़- तोड़े सारे रिकॉर्ड, आम जनता पर बढ़ा बोझ

करीब 12 हजार करोड़ नया कर्ज लेने की योजना

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State Debt

शिमला। हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर सामने आए ताज़ा आंकड़ों ने राज्य की वित्तीय चुनौतियों को और स्पष्ट कर दिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने पिछले तीन वर्षों में लगभग 41,173 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। जिस कारण प्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

करीब 12 हजार करोड़ नया कर्ज लेने की योजना

बतौर रिपोर्टर्स, आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने करीब 11,965 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने की योजना बनाई है। बजट के संशोधित अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में कुल कर्ज देनदारी 1,03,994 करोड़ रुपये रही, जो 2026-27 में बढ़कर 1,12,319 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

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पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े भी इसी बढ़ती प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं- 2022-23 में 76,681 करोड़, 2023-24 में 85,295 करोड़ और 2024-25 में 93,625 करोड़ रुपये का कर्ज दर्ज किया गया।

 80 प्रतिशत बजट इनमें खर्च

हालांकि, करीब 32,004 करोड़ रुपये की अदायगी भी की गई है। बावजूद इसके प्रदेश पर बढ़ते कर्ज के साथ-साथ ब्याज भुगतान का बोझ भी तेजी से बढ़ रहा है। 2024-25 में जहां ब्याज भुगतान 6,260 करोड़ रुपये से अधिक रहा, वहीं 2026-27 में इसके 7,271 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

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आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है, जो वित्तीय प्रबंधन के लिए गंभीर चुनौती है। स्थिति इसलिए भी चिंताजनक मानी जा रही है क्योंकि राज्य का लगभग 80 प्रतिशत बजट वेतन, पेंशन, कर्ज और ब्याज भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चों में ही खर्च हो जाता है।

विकास कार्यों के लिए मात्र 20%

विकास कार्यों और पूंजीगत निवेश के लिए केवल 20 प्रतिशत राशि ही उपलब्ध रह जाती है, जिससे विकास की गति प्रभावित हो सकती है। एक और बड़ा झटका केंद्र सरकार द्वारा रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट बंद किए जाने से लगा है।

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इस फैसले से हिमाचल को आने वाले वर्षों में हजारों करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। पहले हर साल मिलने वाली वित्तीय सहायता अब बंद हो चुकी है, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

पेट्रोल और डीजल पर नया सेस लागू

इसी दबाव को संतुलित करने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर नया सेस लागू करने और एंट्री टैक्स में बढ़ोतरी जैसे कदम उठाए हैं। हालांकि इन फैसलों को लेकर राजनीतिक और जन स्तर पर बहस तेज हो गई है। कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था इस समय कर्ज, घटते राजस्व स्रोत और बढ़ते खर्चों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है।

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