शिमला। हिमाचल प्रदेश में बारिश सिर्फ सड़कों और नालों का रुख नहीं बदलती, कई बार जमीन के भीतर चल रही हलचल भी सामने आने लगती है। शिमला ग्रामीण के शकराला-मल्याणा में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा लोगों की चिंता बढ़ा रहा है।

जमीन के नीचे मची हलचल से सहमे लोग

बारिश के बीच जमीन में हलचल महसूस होने और मकानों में बार-बार दरारें आने से यहां रहने वाले परिवार अपने घरों की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं। लोगों की नजर अब आसमान से बरस रहे पानी के साथ-साथ अपने घरों की दीवारों और जमीन पर भी टिकी है। क्योंकि डर सिर्फ दरारों का नहीं, बल्कि इस बात का है कि कहीं ये दरारें आने वाले किसी बड़े खतरे का संकेत तो नहीं।

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100 भवनों पर मंडराया खतरा

इसी आशंका के बीच क्षेत्र में भू-धंसाव की स्थिति को लेकर प्रशासन ने भी जांच शुरू कर दी है। स्थानीय लोगों के अनुसार प्रभावित इलाके में 100 से अधिक भवन हैं और कई मकानों में लंबे समय से दरारें आती रही हैं। मानसून में जमीन की हलचल बढ़ने के बाद लोगों की चिंता और गहरा गई है।

2010 से देख रहे हैं जमीन की हलचल

स्थानीय निवासी गुलाब सिंह बताते हैं कि इस समस्या को करीब वर्ष 2010 से देखा जा रहा है। उनका चार मंजिला मकान है और उसके ऊपर छत का एक हिस्सा भी बना है। मकान में बार-बार दरारें आने के कारण परिवार को लगातार सुरक्षा की चिंता बनी रहती है। कई बार मरम्मत करवाने के बावजूद दरारें दोबारा दिखाई देने लगती हैं।

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लोग झेल रहे परेशानी

गुलाब सिंह के अनुसार मकान की मरम्मत पर अब तक करीब ढाई से तीन लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं हुई। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले दो-तीन वर्षों में जमीन धंसने की समस्या ज्यादा महसूस होने लगी है।

तीन मकानों में मिली दरारें

मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया है। एसडीएम शिमला ग्रामीण मनजीत शर्मा के अनुसार प्रारंभिक निरीक्षण में फिलहाल तीन मकानों में हल्की दरारें पाई गई हैं। अभी बड़े स्तर पर नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। प्रशासन की ओर से क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है और रिपोर्ट तैयार कर जिला प्रशासन को भेजी जाएगी।

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विशेषज्ञ बताएंगे क्यों खिसक रही जमीन

भू-धंसाव के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं, इसका पता लगाने के लिए विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से वैज्ञानिक अध्ययन करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। विशेषज्ञ क्षेत्र की जमीन की संरचना, जल निकासी और भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करेंगे। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जमीन खिसकने के पीछे प्राकृतिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं या क्षेत्र में हुई मानवीय गतिविधियों का भी इसमें योगदान है।

मलबे और भराव पर मकान बनाने का दावा

स्थानीय लोगों ने क्षेत्र की निर्माण व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि ऊपर की ओर बने भवनों की कटिंग से निकला मलबा नीचे की तरफ जमा हुआ और इसी तरह के भराव पर कई मकान बनाए गए हैं। लोगों को आशंका है कि बारिश का पानी इस मलबे और भराव में जाने से जमीन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

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हालांकि प्रशासनिक और वैज्ञानिक जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भू-धंसाव में इस भराव की कितनी भूमिका है। फिलहाल स्थानीय लोग मानसून के बीच किसी बड़े खतरे की आशंका से चिंतित हैं और चाहते हैं कि जांच जल्द पूरी हो, ताकि उनके घरों और परिवारों की सुरक्षा को लेकर स्थिति साफ हो सके।

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