शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायतों को स्वच्छता के लिए मिलने वाली राशि अब अपनी मर्जी से किसी भी काम पर खर्च नहीं की जा सकेगी। केंद्र सरकार की ओर से 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाली टाइड ग्रांट के उपयोग को लेकर पंचायती राज विभाग ने खर्च की सीमा और कामों की स्पष्ट सूची जारी कर दी है। विभाग ने स्वच्छता मद में राशि खर्च करने के लिए 14 कार्य निर्धारित किए हैं। इनसे अलग किसी काम पर पैसा खर्च किया गया तो उसे अनधिकृत व्यय माना जाएगा और नियमों के अनुसार जिम्मेदारी तय कर राशि की वसूली भी की जा सकती है।

पंचायतों के लिए 14 कामों की सीमा तय

पंचायती राज विभाग ने 25 सितंबर को प्रदेश के सभी संबंधित अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। इनमें जिला परिषदों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला पंचायत अधिकारी और खंड विकास अधिकारियों को पंचायतों में स्वच्छता फंड के इस्तेमाल की निगरानी करने को कहा गया है।

 

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ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद को अब टाइड ग्रांट की स्वच्छता राशि निर्धारित कार्यों पर ही लगानी होगी। इसका उद्देश्य स्वच्छता से संबंधित योजनाओं में खर्च की एकरूपता और निगरानी सुनिश्चित करना है।

सोक पिट से लेकर कचरा परिवहन तक खर्च की सीमा

निर्धारित प्रावधानों के तहत सामुदायिक सोक पिट के निर्माण पर अधिकतम 10 हजार रुपये प्रति पिट और सामुदायिक कंपोस्ट पिट पर 3 हजार रुपये तक खर्च किए जा सकेंगे। गांव में गीले और सूखे कचरे को अलग करने तथा उसके प्रसंस्करण के लिए शेड बनाने पर अधिकतम 20 हजार रुपये खर्च की सीमा रखी गई है। घरों से कचरा एकत्र करने और उसे निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के लिए मोटर वाहन की सेवाओं पर एक ग्राम पंचायत के कवरेज के लिए 10 हजार रुपये प्रति माह तक खर्च किए जा सकेंगे।

 

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सामुदायिक सैनिटरी कॉम्प्लेक्स के निर्माण के लिए अधिकतम 90 हजार रुपये प्रति कॉम्प्लेक्स और उसके रखरखाव के लिए 10 हजार रुपये प्रति माह तक खर्च की अनुमति होगी। कचरा प्रबंधन के लिए स्वच्छता कर्मियों या सपोर्ट एजेंसी की सेवाएं लेने पर भी 10 हजार रुपये मासिक की सीमा तय की गई है। वहीं ब्लॉक या ब्लॉक के किसी हिस्से से कचरा परिवहन की व्यवस्था के लिए सालाना अधिकतम 4 लाख रुपये खर्च किए जा सकेंगे।

कंपोस्ट यूनिट और वेस्ट मैनेजमेंट पर भी प्रावधान

विभागीय निर्देशों के अनुसार ओडीएफ प्लस सत्यापन से जुड़ी प्रति गांव IEC गतिविधियों के लिए 8 हजार रुपये तक खर्च किए जा सकते हैं। सेग्रीगेशन शेड के रखरखाव पर 4 हजार रुपये प्रतिमाह और सामुदायिक कंपोस्ट यूनिट के रखरखाव पर 2,500 रुपये प्रतिमाह की सीमा निर्धारित है। इसी तरह प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट या मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी के रखरखाव के लिए सालाना 3 लाख रुपये तक तथा गोबरधन प्लांट के संचालन और रखरखाव के लिए 2 लाख रुपये सालाना तक खर्च किए जा सकेंगे।

 

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स्लज मैनेजमेंट प्लांट के संचालन एवं रखरखाव के लिए अधिकतम 1 लाख रुपये सालाना की अनुमति होगी। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्वच्छता मद से कराया जाने वाला प्रत्येक काम संबंधित पंचायत के विकास प्लान में शामिल होना चाहिए। यदि 2026-27 की GPDP, BPDP या ZPDP में ऐसा कोई कार्य दर्ज है जो विभाग की निर्धारित सूची में शामिल नहीं है, तो उस पर पैसा खर्च करने से पहले नियमानुसार विकास योजना में संशोधन करना होगा।

पंचायत से जिला स्तर तक होगी निगरानी

स्वच्छता फंड के इस्तेमाल की प्रक्रिया में पंचायत सचिव से लेकर बीडीओ, जिला पंचायत अधिकारी और जिला परिषद के सीईओ की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि राशि तय प्रावधानों के अनुरूप ही खर्च हो।
विभाग ने साफ किया है कि निर्धारित 14 कार्यों के दायरे से बाहर किया गया खर्च अनधिकृत माना जाएगा। ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय होने के साथ नियमों के तहत धनराशि की वसूली भी की जा सकती है। इससे पंचायतों के स्वच्छता फंड के इस्तेमाल पर निगरानी और वित्तीय अनुशासन बढ़ाने की कोशिश की गई है।

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