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November 5, 2026
धारा 118 के उल्लंघन पर सख्त हुआ हाईकोर्ट

शिमला/ऊना। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार को ऊना जिले में कथित अवैध कॉलोनी बसाने के मामले में हाईकोर्ट के सामने जवाब देना होगा। ऊना के रक्कड़ क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश भू-सुधार एवं काश्तकारी अधिनियम की धारा 118 के कथित उल्लंघन कर कॉलोनी विकसित करने के मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार सहित मामले से जुड़े प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल हलफनामे में जमीन की खरीद-फरोख्त, गैर-कृषक की भूमिका, पेड़ों के अवैध कटान और पहाड़ियों को समतल कर कॉलोनी विकसित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने के लिए समय देते हुए अगली सुनवाई 22 दिसंबर निर्धारित की है।
ऊना के रक्कड़ में कथित तौर पर नियमों को दरकिनार कर कॉलोनी विकसित करने का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने मामले में सामने आए नए तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। अब सरकार को अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि संबंधित भूमि पर हुए विकास कार्यों और जमीन से जुड़े समझौतों के मामले में कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं।
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याचिकाकर्ता भावक पराशर ने अदालत में दाखिल हलफनामे में आरोप लगाया है कि संबंधित जमीन पर धारा 118 के प्रावधानों की अनदेखी कर कॉलोनी विकसित करने की गतिविधियां की गईं। हलफनामे के अनुसार प्रतिवादी इंदु वालिया के पति राम प्रकाश को पहले ही धारा 118 के तहत गैर-कृषक घोषित किया जा चुका है। इस फैसले के खिलाफ दायर अपील भी खारिज हो चुकी है। ऐसे में गैर-कृषक और जमीन मालिकों के बीच संयुक्त विकास समझौते (जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट) के लिए जरूरी सरकारी अनुमति को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।
मामले में जमीन के स्वामित्व को लेकर भी महत्वपूर्ण तथ्य अदालत के सामने रखे गए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, जिस कुल 11.96 हेक्टेयर भूमि पर कॉलोनी विकसित करने की बात सामने आई है, उसमें से केवल 5.16 हेक्टेयर जमीन ही इंदु वालिया के नाम दर्ज थी। ऐसे में बाकी जमीन के स्वामित्व और विकास गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि संबंधित भूमि पर कॉलोनी विकसित करने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं और सरकारी अनुमतियों की उचित जांच नहीं की गई।
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रक्कड़ में जमीन पर हुए विकास कार्यों के दौरान पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का मामला भी सामने आया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, संबंधित भूमि पर जापानी तूत, सिंबल और तुनी प्रजाति के पेड़ों का अवैध कटान किया गया था। इस मामले में 1 लाख 1 हजार रुपये का जुर्माना और 3 लाख 83 हजार 870 रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और उपायुक्त ऊना की रिपोर्टों में भी इस भूमि से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की बात याचिकाकर्ता ने अदालत में कही है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित क्षेत्र में कॉलोनी बसाने के उद्देश्य से पहाड़ियों को समतल करने का काम किया जा रहा था। आरोप है कि इस दौरान पर्यावरणीय और भूमि संबंधी नियमों की अनदेखी हुई। मामले में यह सवाल भी उठाया गया है कि जब जमीन और संबंधित व्यक्तियों की कानूनी स्थिति को लेकर पहले से आदेश मौजूद थे, तो इसके बावजूद विकास गतिविधियों को लेकर आवश्यक अनुमति और निगरानी सुनिश्चित क्यों नहीं की गई।
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सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों की ओर से याचिकाकर्ता के हलफनामे में उठाए गए नए तथ्यों पर जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए सभी संबंधित पक्षों को जवाब देने का अवसर दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 दिसंबर को होगी। उस दिन सरकार और प्रतिवादियों के जवाब के आधार पर मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही महत्वपूर्ण हो सकती है।
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हिमाचल प्रदेश में धारा 118 के तहत गैर-कृषकों द्वारा जमीन खरीदने और उससे जुड़े विकास कार्यों के लिए निर्धारित कानूनी शर्तों का पालन करना जरूरी है। रक्कड़ का यह मामला इसी व्यवस्था के तहत सरकारी अनुमति, जमीन के स्वामित्व और कथित अवैध विकास गतिविधियों को लेकर महत्वपूर्ण हो गया है। फिलहाल हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर सरकार से जवाब मांगा है। अब सबकी निगाहें 22 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेंगी, जहां यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इन आरोपों और अदालत के सामने रखे गए तथ्यों पर क्या जवाब देती है।