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November 7, 2026
शहीद फौजी की पत्नी ने दिया था श्राप, ग्रामीण निभा रहे पुरानी परंपरा

हमीरपुर। देशभर में दिवाली का त्योहार आते ही हर घर रोशनी से जगमगाने लगता है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, घरों में पकवान बनने लगते हैं और लोग रंग-बिरंगी लाइटों, दीयों और मोमबत्तियों से अपने आशियाने सजाने में जुट जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में भी दिवाली का इंतजार हर गांव और हर घर में बड़ी बेसब्री से किया जाता है। लेकिन इसी देवभूमि में एक ऐसा गांव भी है, जहां दिवाली की तैयारियां नहीं होतीं, न घरों में दीये जलाए जाते हैं और न ही पटाखे फोड़े जाते हैं।
हमीरपुर जिले के भोरंज क्षेत्र में स्थित सम्मू गांव में पिछले कई सालों से दिवाली नहीं मनाई जाती। इसके पीछे एक ऐसी लोकमान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा जुड़ी है, जो आज भी ग्रामीणों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। कहा जाता है कि एक शहीद सैनिक की पत्नी ने दिवाली नहीं मनाने का श्राप दिया था। हैरानी की बात यह है कि आधुनिक दौर में भी गांव के लोग अपने बुजुर्गों से मिली इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
सम्मू गांव के बुजुर्गों से चली आ रही मान्यता के अनुसार, यह घटना सतयुग के समय की बताई जाती है, जब राजाओं की सेनाएं हुआ करती थीं और सैनिक युद्ध के मैदान में देश-राज्य की रक्षा के लिए जाया करते थे। गांव की एक महिला का पति भी सेना में सैनिक था। दिवाली के अवसर पर महिला अपने बेटे के साथ मायके जा रही थी। इसी दौरान रास्ते में उसे कुछ सैनिक सामान लेकर आते दिखाई दिए।
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सैनिकों ने महिला से पूछा कि यह सामान किस सैनिक का है। इस पर महिला ने कथित तौर पर उस सामान को अपने पति का बताते हुए कहा कि इसे यहीं रख दिया जाए। लोककथा के अनुसार, महिला को अपने पति की मृत्यु का आभास हुआ और वह पति के सामान तथा अपने बेटे के साथ सती हो गई। सती होने से पहले उसने सम्मू गांव के लोगों को श्राप दिया कि आने वाली सात पीढ़ियों तक गांव में कोई भी दिवाली का त्योहार नहीं मनाएगा। ग्रामीणों का मानना है कि उसी घटना के बाद से गांव में दिवाली मनाने की परंपरा बंद हो गई।
गांव के लोगों के बीच इस मान्यता को लेकर आज भी गहरी आस्था है। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ वर्ष पहले कुछ परिवारों ने इस परंपरा को छोड़कर दिवाली मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उसी दौरान उनकी गौशाला में अचानक आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते गौशाला में रखा सामान जलकर राख हो गया। गांव की उर्मिला के अनुसार, इसी तरह की घटनाओं और पुरखों से सुनी बातों के चलते ग्रामीण दिवाली मनाने से परहेज करते हैं। उनका कहना है कि जब भी किसी ने परंपरा से हटकर त्योहार मनाने का प्रयास किया, तो किसी न किसी तरह की अनहोनी या बीमारी होने की बात सामने आई।
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सम्मू गांव की इस परंपरा का एक और खास पहलू है। यहां दिवाली के दौरान भले ही घरों में उत्सव नहीं मनाया जाता, लेकिन त्योहार के बाद सती हुई महिला और उसके परिवार को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। ग्रामीण जगदीश चंद रंगड़ा के अनुसार, गांव के लोगों के घरों में सती महिला की प्रतिमा रखी हुई है। दिवाली बीतने के बाद इन प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीण इस पूजा को अपनी पुरानी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। उनका यह भी कहना है कि पूजा के दौरान यदि अचानक कोई मेहमान घर आ जाए तो पूजा को सफल नहीं माना जाता और उसे दोबारा करना पड़ता है।
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आज के समय में जहां नई पीढ़ी त्योहारों को नए अंदाज में मनाने और पुरानी परंपराओं को बदलने में विश्वास रखती है, वहीं सम्मू गांव के युवा भी अपने पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा को निभा रहे हैं। गांव के युवा दिव्यांश ठाकुर का कहना है कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से इस घटना के बारे में सुना है और उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं। हालांकि, उनके मन में दिवाली न मना पाने का मलाल भी रहता है। उनका कहना है कि उनके लिए यह महज अंधविश्वास का विषय नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली एक ऐसी परंपरा है, जिसे परिवार और गांव के लोग पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।