शिमला। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनावों से लेकर उनके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन का रास्ता अब सचिवालय के बजाय सीधे हाईकोर्ट की चौखट से होकर गुजर रहा है। चाहे पंचायती राज संस्थाएं हों या शहरी निकाय, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में हो रही देरी का मामला बार-बार अदालत पहुंच रहा है। ताजा घटनाक्रम में, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नगर परिषद पांवटा साहिब के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया को अधर में लटकाने के आरोपों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच रही हर चुनावी प्रक्रिया!
हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ समय से यह ट्रेंड देखने को मिल रहा है कि चुनाव और उनके नतीजों के बाद की प्रक्रियाओं को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच की जंग अदालत में तब्दील हो रही है। इससे पहले राज्य में पंचायत चुनाव टालने को लेकर भी हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार को आड़े हाथों लिया था और सरकार से जवाब तलब करते हुए मई माह तक चुनाव करवाने के कड़े निर्देश दिए थे। अब ठीक वैसा ही नजारा नगर परिषदों में भी देखने को मिल रहा है, जहां चुनाव संपन्न होने के बावजूद चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन की कुर्सी का फैसला कानूनी दांवपेंच में उलझ गया है।
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माननीय न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिए कड़े निर्देश
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर व न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश दिया है कि एक सप्ताह के भीतर एसडीएम और राज्य चुनाव आयोग रिकॉर्ड पर अपनी रिपोर्ट पेश करें। अदालत ने साफ शब्दों में पूछा है कि अधिकारियों ने निर्वाचन से संबंधित अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन किस प्रकार किया और बैठकें बार-बार क्यों टाली गईं। हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को आगामी 6 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
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मई में नतीजे, जून बीतने पर भी नहीं मिला अध्यक्ष
नगर परिषद पांवटा साहिब के नवनिर्वाचित पार्षद कुलदीप चौधरी व अन्य ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका के अनुसार, नगर परिषद के लिए 17 मई को मतदान हुआ था और उसी दिन परिणाम घोषित कर दिए गए थे। इसके बाद 23 मई को राज्य चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश म्युनिसिपल एक्ट, 1994 की धारा 27(2) व म्युनिसिपल चुनाव नियम, 2015 के नियम 80 के तहत अधिसूचना भी जारी कर दी थी। पार्षदों का तर्क है कि जब सारी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो पहली बैठक बुलाने और अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव कराने में कोई भी कानूनी बाधा नहीं है।
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एसडीएम की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद एसडीएम पांवटा साहिब अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को निभाने में नाकाम रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश सरकार ने खुद 27 मई को प्रधान सचिव (शहरी विकास) के माध्यम से सभी उपायुक्तों को पत्र भेजकर जल्द से जल्द पहली बैठक बुलाने और पार्षदों को शपथ दिलाने के निर्देश दिए थे।
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तारीख पर तारीख: उपायुक्त के आदेश भी रहे बेअसर
सिरमौर के उपायुक्त ने 29 मई को ही एसडीएम को बैठक बुलाने का लिखित आदेश जारी कर दिया था। इसके बाद पीठासीन अधिकारी ने पहले 2 जून और फिर 9 जून को बैठक के लिए नोटिस जारी किया। हद तो तब हो गई जब 12 जून को एक शुद्धिपत्र (कोरिजेंडम) जारी कर इन तारीखों को बदलते हुए बैठक को अगले आदेशों तक के लिए स्थगित कर दिया गया। पार्षदों का आरोप है कि राजनीतिक लाभ और दबाव के चलते इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया जा रहा है, जिसके बाद उन्हें न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
