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August 13, 2026

हिमाचल में ग्लेशियर झील फटी तो मचेगी तबाही! ब्यास-सतलुज किनारे अलर्ट- खतरे में कई गांव

सतलुज घाटी में स्थिति बेहद गंभीर बताई गई है

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शिमला। हिमालय की ऊंची चोटियों पर मौजूद ग्लेशियर झीलें और तेजी से बदलता मौसम हिमाचल के लिए भविष्य का बड़ा खतरा बन सकते हैं। वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि अगर किसी ग्लेशियर झील के अचानक टूटने के साथ उसी समय अत्यधिक बारिश हो जाए तो ब्यास और सतलुज नदियां बेहद विकराल रूप ले सकती हैं।

ग्लेशियर झील फटी तो मचेगी तबाही

ऐसी स्थिति में दोनों नदी घाटियों में 680 से अधिक ढांचे बाढ़ की चपेट में आकर ध्वस्त हो सकते हैं। इनमें जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े ढांचे, धार्मिक स्थल और नदी किनारे मौजूद अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं शामिल हैं।

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जलविद्युत व्यवस्था से खड़ा हुआ खतरा

यह खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ब्यास और सतलुज हिमाचल की जलविद्युत व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। दोनों नदी घाटियों में बड़ी संख्या में बिजली परियोजनाएं और उनसे जुड़ा बुनियादी ढांचा मौजूद है। ऐसे में बाढ़ की चरम स्थिति केवल नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के ऊर्जा ढांचे के लिए भी बड़ा संकट पैदा कर सकती है।

ब्यास में 17 हजार और सतलुज में 24 हजार क्यूमेक तक प्रवाह

अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी: रीजनल स्टडीज में प्रकाशित इस अध्ययन में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF और अत्यधिक बारिश से आने वाली बाढ़ को एक साथ जोड़कर संभावित परिस्थितियों का मॉडल तैयार किया गया है।

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2 साल से 100 साल की बाढ़...

अध्ययन के अनुसार ऐसी चरम स्थिति में ब्यास नदी का अधिकतम बाढ़ प्रवाह 17,356 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकता है। वहीं सतलुज में यह आंकड़ा 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। शोधकर्ताओं ने 2 वर्ष से लेकर 100 वर्ष की बाढ़ की घटनाओं का भी अध्ययन किया।

पंडोह और भाखड़ा के पास सबसे बड़ा खतरा

अध्ययन में ब्यास नदी पर पंडोह बांध और सतलुज पर भाखड़ा बांध के आसपास संभावित बाढ़ के प्रभाव का विशेष आकलन किया गया है। पंडोह के पास केवल संभावित अधिकतम बाढ़ यानी PMF की स्थिति में अधिकतम प्रवाह 17,086 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंचने का अनुमान है। जब इसमें ग्लेशियल झील टूटने और अत्यधिक बारिश से आने वाले पानी को भी शामिल किया गया तो प्रवाह बढ़कर 17,356 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया।

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घाटी में स्थिति गंभीर

सतलुज घाटी में स्थिति इससे भी गंभीर बताई गई है। भाखड़ा बांध के पास PMF का अधिकतम प्रवाह 23,478 घन मीटर प्रति सेकंड आंका गया। GLOF और अत्यधिक बारिश को एक साथ मॉडल करने पर यह 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया।

680 से ज्यादा ढांचे खतरे की जद में

शोध में सामने आया है कि इस तरह की संयुक्त आपदा की स्थिति में ब्यास और सतलुज नदी घाटियों में 680 से अधिक ढांचे प्रभावित या ध्वस्त हो सकते हैं। नदी के आसपास मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के साथ जलविद्युत परियोजनाएं और धार्मिक स्थल भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इसका मतलब है कि किसी एक प्राकृतिक घटना के बजाय दो घटनाओं का एक साथ होना नुकसान को कई गुना बढ़ा सकता है।

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सिर्फ ग्लेशियर झीलों की निगरानी काफी नहीं

शोधकर्ताओं ने भविष्य की आपदा चेतावनी व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उनके मुताबिक सिर्फ ग्लेशियल झीलों की निगरानी करके संभावित खतरे का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अर्ली वार्निंग सिस्टम में ग्लेशियल झीलों की स्थिति के साथ ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में हो रही बारिश, नदी के तत्काल जलप्रवाह और नीचे बाढ़ के संभावित फैलाव की भी एक साथ निगरानी जरूरी है।

खतरे में कई गांव

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि ग्लेशियर झील टूटने और अत्यधिक बारिश की संयुक्त घटनाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए मॉडल पश्चिमी हिमालय की अन्य ग्लेशियरयुक्त नदी घाटियों के लिए भी भविष्य की आपदा तैयारी में उपयोगी हो सकते हैं।

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