शिमला/धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश पर एक बड़ा खतरा मंडराने लगा है। यह खतरा प्रदेश के पहाड़ों से लेकर मैदानों तक भयंकर तबाही मचा सकता है। यानी हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत पहाड़ अब एक खामोश लेकिन गंभीर खतरे की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। बाहर से शांत और मनमोहक दिखने वाली वादियों के भीतर दोहरी आपदा का खतरा तेजी से पनप रहा है। ऊपर ग्लेशियर झीलों का बढ़ता आकार और नीचे कमजोर होती धरती। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए] तो हिमाचल को भविष्य में भीषण बाढ़ और विनाशकारी भूकंप जैसी दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है।
ग्लेशियर झीलें बनीं बड़ा खतरा
हिमाचल में कई ग्लेशियर झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने चार झीलों कुल्लू की वासुकी नाग झील, लाहौल-स्पीति की घेपन (गिपांग) झील, बास्पा झील और कालका झील—को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा है। इन झीलों में भारी मात्रा में पानी जमा है, जो किसी भी समय खतरा बन सकता है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार घेपन झील का दायरा पिछले 33 वर्षों में 176 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। अब यह झील 100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैल चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह झील फटती है, तो इसका असर केवल लाहौल-स्पीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निचले क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का कारण बन सकता है।
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वासुकी नाग झील से पार्वती घाटी पर खतरा
कुल्लू की वासुकी नाग झील का बढ़ता जलस्तर भी चिंता का विषय है। विशेषज्ञों के अनुसार, झील फटने की स्थिति में इसका पानी सीधे पार्वती नदी में जाएगा, जिससे पार्वती घाटी के गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और खेती की जमीन प्रभावित हो सकती हैं।
कुछ ही मिनटों में मच सकती है तबाही
ग्लेशियर झील फटने की घटनाएं बेहद खतरनाक होती हैं। ऊंचाई पर स्थित इन झीलों से अचानक लाखों क्यूबिक मीटर पानी नीचे की ओर बहता है, जिससे नदियां उफान पर आ जाती हैं और निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। ऐसे हालात में लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिलता।
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सिक्किम हादसा बना चेतावनी
देश में पहले भी ग्लेशियर झील फटने के खतरनाक परिणाम देखे जा चुके हैं। सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील के फटने से हुई तबाही ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ये झीलें कितनी विनाशकारी हो सकती हैं। अब वैज्ञानिकों को आशंका है कि हिमाचल में भी ऐसा खतरा मंडरा रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययन शुरू
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हिमाचल में पहली बार इन झीलों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया जा रहा है। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान की टीम कुल्लू, मंडी और लाहौल घाटी में जाकर झीलों का सर्वे करेगी। इसमें झीलों का आकार, आसपास की जमीन की स्थिति और संभावित खतरे का आकलन किया जाएगा।
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क्या है अध्ययन का मुख्य उद्देश्य
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि यदि कोई ग्लेशियर झील फटती है, तो उससे कितना नुकसान हो सकता है. वैज्ञानिक यह भी आकलन करेंगे कि बाढ़ का पानी किन-किन क्षेत्रों को प्रभावित करेगा और कितनी तेजी से नीचे की ओर फैलेगा. इससे संभावित आपदा के जोखिम को समझने में मदद मिलेगी. इस परियोजना के तहत पार्वती घाटी की झीलों को इंटरवेंशन साइट के रूप में चुना गया है. खास तौर पर वासुकी नाग झील और अन्य ग्लेशियर झीलों पर फोकस रहेगा, क्योंकि इनका दायरा लगातार बढ़ रहा है और ये भविष्य में बड़ा खतरा बन सकती हैं.
अर्ली वार्निंग सिस्टम की तैयारी
प्रशासन अब इन झीलों के आसपास अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना बना रहा है। इससे झीलों के जलस्तर में अचानक बदलाव या खतरे के संकेत मिलने पर तुरंत अलर्ट जारी किया जा सकेगा और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा।
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ग्लोबल वार्मिंग बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि इन खतरों के पीछे सबसे बड़ी वजह ग्लोबल वार्मिंग है। हिमाचल में बर्फबारी कम हो रही है, सर्दियां छोटी हो रही हैं और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार बढ़ रहा है।
भूकंप का खतरा भी बढ़ा
धर्मशाला में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में प्रसिद्ध भू-विज्ञानी पद्मश्री डॉ. हर्ष के गुप्ता ने चेतावनी दी कि हिमाचल अब भूकंप के लिहाज से पहले से अधिक संवेदनशील हो गया है। कांगड़ा क्षेत्र को सिस्मिक जोन-5 से भी अधिक खतरे वाले स्तर पर माना जा रहा है, जिसे वैज्ञानिक अनौपचारिक रूप से “जोन-6 जैसी स्थिति” बता रहे हैं।
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ग्लेशियर पिघलने से बिगड़ रहा संतुलन
विशेषज्ञों के अनुसार, जब भारी मात्रा में ग्लेशियर पिघलते हैं, तो पहाड़ों के नीचे दबाव का संतुलन बदल जाता है। इससे भूगर्भीय फॉल्ट लाइनों पर असर पड़ता है और भूकंप की संभावना बढ़ जाती है। यानी ऊपर झीलों का खतरा और नीचे भूकंप का जोखिम—दोनों मिलकर स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।
दोहरी आपदा का खतरा
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी बड़े भूकंप के बाद ग्लेशियर झील फटती है, तो यह स्थिति बेहद भयावह हो सकती है। पहले भूकंप से नुकसान होगा और फिर झील का पानी व मलबा पूरे इलाके में तबाही मचा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब हिमाचल में निर्माण के पुराने तरीके नहीं चलेंगे। भूकंपरोधी इमारतें, सुरक्षित स्थानों की पहचान, और त्वरित निकासी योजनाएं बनाना बेहद जरूरी है। साथ ही लोगों को इस खतरे के प्रति जागरूक करना भी समय की मांग है।
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देशभर में बढ़ रहा खतरा
बता दें कि देश में करीब 7,500 से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 195 को हाई रिस्क के रूप में चिन्हित किया गया है। ये झीलें हिमाचल, उत्तराखंड, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में स्थित हैं। इन झीलों पर ग्लोबल वार्मिंग का असर तेजी से देखने को मिल रहा है। हिमाचल की ग्लेशियर झीलें अब सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का हिस्सा नहीं, बल्कि संभावित खतरे का संकेत भी बन चुकी हैं। सरकार और वैज्ञानिकों की यह पहल आने वाले समय में बड़े नुकसान को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है, लेकिन इसके लिए समय रहते ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है।
