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January 21, 2026

हिमाचल की इस घाटी में 40 दिन टूरिज्म बंद : एक दूसरे से बात नहीं करेंगे गांव वाले, ना ही बजेगा मोबाइल

बर्फबारी का आकर्षण, लेकिन यात्रा टालने की सलाह

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लाहौल-स्पीति। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल–स्पीति घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए काम की खबर है। यहां अगले 40 दिन के लिए पर्यटन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इतना ही नहीं इन 40 दिनों में ना तो यहां TV रेडियो चलेगा और ना ही किसी के फोन की घंटी बजेगी।

40 दिन टूरिज्म बंद

आपको बता दें कि ये स्वैच्छिक प्रतिबंध सिस्सू और कोकसर पंचायतों ने लगाया है। जिसके अनुसार, 20 जनवरी कल से लेकर 28 फरवरी तक पर्यटन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। 

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मनोरंजन के साधनों पर भी रोक

इस प्रतिबंध के दौरान न केवल बाहरी पर्यटकों की आवाजाही सीमित रहेगी, बल्कि मनोरंजन से जुड़े सभी साधनों पर भी स्थानीय लोग स्वयं नियंत्रण रखेंगे। यह फैसला किसी प्रशासनिक आदेश के तहत नहीं, बल्कि सदियों पुरानी देव परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के निर्वहन के लिए लिया गया है।

शांति ही सबसे बड़ी आस्था

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में घाटी के आराध्य देव ‘राजा घेपन’ या तो स्वर्ग प्रवास पर होते हैं या फिर कठोर तपस्या में लीन रहते हैं। देवता की तपस्या में किसी भी तरह का व्यवधान न पड़े, इसके लिए पूरी घाटी में शांति बनाए रखना अनिवार्य माना जाता है। यही कारण है कि इन 40 दिनों के दौरान शोर-शराबा, तेज संगीत, अनावश्यक आवाजाही और उत्सवधर्मिता पर पूरी तरह रोक रहती है।

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शोर-शराबे पर पूरी  तरह रोक

परंपरा इतनी गहरी है कि कई परिवार इस दौरान टीवी, रेडियो और मोबाइल फोन तक का इस्तेमाल बंद कर देते हैं। गांवों में शाम ढलते ही एक अलौकिक सन्नाटा छा जाता है, जिसे लोग देवता की उपस्थिति और साधना का प्रतीक मानते हैं।

गलती से पहुंचे पर्यटकों से भी संयम की अपील

हालांकि इस अवधि में सिस्सू और कोकसर आने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं है, लेकिन स्थानीय देव कमेटी और पंचायतों ने पर्यटकों से विशेष अपील की है कि अगर कोई यात्री अनजाने में यहां पहुंच जाए, तो वह पूरी मर्यादा और संयम का पालन करे। तेज हॉर्न बजाना, गाड़ियों में ऊंची आवाज में म्यूजिक चलाना, हुड़दंग मचाना या भीड़ इकट्ठा करना सख्त वर्जित माना जाता है।

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आसुरी शक्तियों की सक्रियता

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह घाटी सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आस्था और परंपराओं की जीवंत भूमि है, जहां कुछ समय के लिए प्रकृति और देवताओं को पूर्ण शांति देना जरूरी समझा जाता है। इन 40 दिनों के दौरान घाटी में आसुरी शक्तियों के सक्रिय होने की भी मान्यता है।

हालडा उत्सव और ‘बल राजा’ की स्थापना

 इन्हीं शक्तियों के नाश और क्षेत्र की रक्षा के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। 27 जनवरी से शुरू होने वाले हालडा उत्सव के बाद लगातार तीन दिनों तक हर घर में ‘बल राजा’ की स्थापना की जाती है। इसे सामूहिक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी लोग पूरे विश्वास के साथ इसका पालन करते हैं।

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बदलते हालात और बढ़ती चुनौती

सिस्सू पंचायत के उप-प्रधान संदीप बताते हैं कि पहले सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बाहरी लोगों का यहां पहुंचना लगभग असंभव होता था। ऐसे में देव परंपराओं का निर्वहन स्वाभाविक रूप से बिना किसी बाधा के हो जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में मौसम के मिजाज में बदलाव आया है। बर्फ कम गिर रही है और अटल टनल के बनने से लाहौल घाटी तक पहुंचना बेहद आसान हो गया है।

 

परिणामस्वरूप सर्दियों में भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचने लगे हैं, जिससे घाटी की पारंपरिक शांति प्रभावित हो रही है। इसी को देखते हुए देव कमेटी ने हालडा उत्सव और तपस्या काल के दौरान टूरिज्म एक्टिविटी पर स्पष्ट बैन लगाने का निर्णय लिया।

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होटल, ढाबे और होम-स्टे तक बंद

देवता की तपस्या में किसी भी तरह की रुकावट न आए, इसके लिए स्थानीय लोग अपने व्यापारिक हितों को भी पीछे छोड़ देते हैं। कोकसर पंचायत में इस अवधि के दौरान लगभग सभी होटल, ढाबे, रेस्टोरेंट और होम-स्टे पूरी तरह बंद रहते हैं। लोग अपने प्रतिष्ठानों पर ताले लगा देते हैं और घाटी को शांत रखने में योगदान देते हैं।

 

वहीं सिस्सू में स्थिति थोड़ी अलग है। यहां हाईवे के किनारे कई व्यापारिक प्रतिष्ठान अब बाहरी लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में सभी जगह पूर्ण बंद संभव नहीं हो पाता, लेकिन स्थानीय परिवार फिर भी अपने स्तर पर परंपरा का पालन करते हैं।

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बर्फबारी का आकर्षण, लेकिन यात्रा टालने की सलाह

हालांकि इस बार हिमाचल के अधिकांश हिस्सों में बर्फबारी नहीं हुई है, लेकिन सिस्सू और कोकसर में हाल ही में अच्छी बर्फ गिरी है। इसी वजह से देशभर से मनाली पहुंचने वाले पर्यटक इन इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। मगर स्थानीय लोगों और पंचायतों ने साफ संदेश दिया है कि प्रतिबंध अवधि के दौरान पर्यटकों को अपनी यात्रा स्थगित करनी चाहिए।

 

मनाली से अटल टनल होकर सिस्सू और कोकसर पहुंचने में लगभग सवा एक घंटे का समय लगता है, लेकिन यह आसान रास्ता भी इन 40 दिनों में घाटी की शांति से अधिक महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा।

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आस्था बनाम पर्यटन

लाहौल–स्पीति ही नहीं, बल्कि कुल्लू घाटी के कई हिस्सों में भी देवी-देवताओं के स्वर्ग प्रवास की मान्यता प्रचलित है। सिस्सू और कोकसर में लगाया गया यह प्रतिबंध इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक पर्यटन और प्राचीन आस्था के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी है।

देवता कर सकें तपस्या

स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर परंपराएं सुरक्षित रहेंगी, तभी यह घाटी अपनी आत्मा को बचाए रख पाएगी। इसलिए हर साल की तरह इस बार भी 40 दिनों के लिए पर्यटन पर विराम लगाया गया है- ताकि देवता तपस्या कर सकें और घाटी में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।

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