#उपलब्धि
January 20, 2026
विश्व भर में चमका हिमाचल- सबसे बड़ा फार्मा हब बनकर उभरा, दुनिया को दे रहा हर तरह की दवा
करीब 40 प्रतिशत तकनीकी और गैर-तकनीकी स्टाफ हिमाचल से ही मिल रहा है।
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सोलन। जब पूरी दुनिया एक स्वस्थ, सुलभ और भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था की तलाश में आगे बढ़ रही है। तब भारत अपने ज्ञान, उद्योग, विज्ञान और कर्मठता के बल पर न केवल अपने नागरिकों की सेहत की रक्षा कर रहा है, बल्कि 175 से अधिक देशों के स्वास्थ्य तंत्र का मजबूत आधार भी बन चुका है।
इस वैश्विक भरोसे की जमीनी तस्वीर हिमाचल प्रदेश के बद्दी में साफ दिखाई देती है, जो आज एशिया के सबसे बड़े फार्मा हब के रूप में भारत की औषधीय ताकत का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
वर्ष 2003 में केंद्र सरकार के विशेष औद्योगिक पैकेज के साथ बद्दी में फार्मा उद्योग की नींव पड़ी थी। तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि दो दशकों के भीतर यह क्षेत्र भारत की दवा उत्पादन क्षमता का एक अहम स्तंभ बन जाएगा।
आज स्थिति यह है कि वैक्सीन को छोड़कर लगभग हर जरूरी दवा का निर्माण हिमाचल प्रदेश में हो रहा है, और बद्दी इसका प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह केवल उद्योग की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की गाथा है, जिसने स्वास्थ्य को व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म माना है।
बद्दी की फार्मा यात्रा उस भारतीय दर्शन को व्यवहार में बदलती है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी है। यहां बनी हर दवा की शीशी में भारत का श्रम, विज्ञान और संकल्प समाहित है, जो सीमाओं से परे मानवता की सेवा कर रहा है। यही कारण है कि भारतीय दवाएं आज अफ्रीका, एशिया, यूरोप और अमेरिका तक भरोसे के साथ इस्तेमाल की जा रही हैं।
एक समय ऐसा था जब बद्दी के उद्योगों को तकनीकी स्टाफ और श्रमिकों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। स्थानीय भागीदारी महज 5 प्रतिशत तक सीमित थी। मगर आज छवि पूरी तरह बदल चुकी है।
अब करीब 40 प्रतिशत तकनीकी और गैर-तकनीकी स्टाफ हिमाचल से ही मिल रहा है। यह बदलाव सिर्फ रोजगार का नहीं, बल्कि एक सशक्त, आत्मनिर्भर और कुशल समाज के निर्माण का संकेत है, जहां स्थानीय युवा वैश्विक स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा कर रहे हैं।
दवा उत्पादन के साथ-साथ प्रिंटिंग, पैकेजिंग, फॉयल निर्माण और अन्य सहायक उद्योगों का हिमाचल में ही विकसित होना इस बात का प्रमाण है कि भारत फार्मा क्षेत्र में केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पूरा इकोसिस्टम खड़ा कर रहा है। इससे गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत हुआ है, लागत संतुलित रही है और समय पर आपूर्ति संभव हुई है। यही वजह है कि भारतीय दवाएं सस्ती होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती हैं और विकसित देशों के स्वास्थ्य तंत्र का भी भरोसा बनी हुई हैं।
GST लागू होने के बाद कर छूट समाप्त होने से बद्दी के कुछ उद्योग जरूर बाहर गए और गुजरात जैसे राज्यों से प्रतिस्पर्धा बढ़ी, लेकिन इसके बावजूद हिमाचल का फार्मा आधार कमजोर नहीं पड़ा। मजबूत बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित मानव संसाधन और वर्षों में बनी विश्वसनीयता आज भी इसे प्रतिस्पर्धा में बनाए हुए हैं।
फार्मा उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल को लेकर रही है, जिसमें लंबे समय तक चीन पर निर्भरता बनी रही। अब केंद्र और राज्य सरकारें इस निर्भरता को कम करने के लिए बल्क ड्रग पार्क, नीति समर्थन और निवेश प्रोत्साहन जैसे ठोस कदम उठा रही हैं।
फिलहाल, हिमाचल में दवा उत्पादन के लिए केवल करीब 2 प्रतिशत कच्चा माल स्थानीय रूप से उपलब्ध है, लेकिन अगले पांच वर्षों में देश में 60 प्रतिशत से अधिक कच्चा माल स्वदेशी होने की उम्मीद है। यह बदलाव भारत को न केवल दवाओं का, बल्कि उनके कच्चे माल का भी वैश्विक केंद्र बना सकता है।
बीते कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में बिजली, परिवहन, औद्योगिक शेड, तकनीकी शिक्षा, श्रमिक उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इन सुधारों ने दवा उत्पादन को आसान और प्रतिस्पर्धी बनाया है। हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के चेयरमैन सतीश सिंघल के अनुसार, ये बदलाव न केवल उद्योग को मजबूती दे रहे हैं, बल्कि भारत को तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहे हैं।
भारत की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां की दवाएं केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विकसित देशों के स्वास्थ्य तंत्र का भी भरोसा हैं। किफायती इलाज, कुशल डॉक्टर, मजबूत फार्मा उद्योग और तकनीकी दक्षता ने भारत को अब दुनिया के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली देश बन गया। प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. देवी शेट्टी के शब्दों में, भारत आज ऐसा देश बन चुका है, जहां उच्च गुणवत्ता का इलाज आम नागरिक की पहुंच में है और यही किसी भी स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी पूंजी होती है।