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January 26, 2026
बोधराज को मिलेगी देव कमरुनाग की गूर गद्दी- बारिश करवाने में हुए सफल, पुराने पुजारी को हटाया
बड़ा देव कमरूनाग के गूर देवी सिंह को गद्दी से हटाया
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मंडी। हिमाचल प्रदेश के लोक देवता बड़ा देव कमरुनाग से जुड़े गूर (देववाणी वाहक) के चयन को लेकर चला आ रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है। लंबे समय से चल रही असमंजस और मतभेदों के बीच बड़ा देव कमरुनाग की गद्दी नए गूर को सौंप दी गई है।
सात गढ़ क्षेत्र के लोगों ने देव परंपराओं के अनुरूप सर्वसम्मति से पुजारी बोधराज को बड़ा देव कमरुनाग का गूर स्वीकार करने का निर्णय लिया है। यह फैसला देवता के परता स्थल धगयारा गलू में आयोजित विशाल धार्मिक जुटान के दौरान लिया गया।
रविवार को धगयारा गलू में सात गढ़ के सैकड़ों किसान, बागवान और श्रद्धालु एकत्रित हुए। गूर की गद्दी को लेकर चल रहे विवाद के कारण माहौल शुरू में तनावपूर्ण जरूर रहा। इस दौरान पूर्व गूर देवी सिंह ठाकुर के समर्थक भी बड़ी संख्या में मौके पर पहुंचे- जिससे दोनों पक्षों के बीच कई बार तीखी बहस और धार्मिक तर्क-वितर्क देखने को मिला। हालांकि, देव परंपरा और क्षेत्रीय एकता को प्राथमिकता देते हुए अंततः सात गढ़ से आए लोगों ने पुजारी बोधराज के पक्ष में एकजुट होकर फैसला लिया।
निर्णय होते ही देव स्थल पर शांति का माहौल बन गया और विवाद का पटाक्षेप हो गया। सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय के अनुसार पुजारी बोधराज आगामी मंडी अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि मेले में देवता कमरुनाग के साथ पुजारी के रूप में ही मंडी जाएंगे।
मेले के समापन के बाद नव संवत के पावन अवसर पर धार्मिक विधि-विधान और देव रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें औपचारिक रूप से गूर पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। इससे पहले सभी आवश्यक धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी।
जानकारी के अनुसार कुछ दिन पहले पूर्व गूर देवी सिंह ठाकुर द्वारा दिया गया परता सात गढ़ के लोगों को मान्य नहीं हुआ था। इसी के बाद से लगातार बैठकों, आपसी संवाद और धार्मिक विमर्श का दौर चल रहा था। अंततः धगयारा गलू में आयोजित महाजुटान में पुजारी बोधराज के नाम पर सभी की सहमति बन पाई।
देवता कमरुनाग के कटवाल चिंतराम ठाकुर ने बताया कि यह निर्णय सात गढ़ के लोगों की सामूहिक सहमति से लिया गया है। उन्होंने कहा कि पुजारी बोधराज को गूर बनाए जाने का फैसला देव परंपरा के अनुरूप है और आगे की सभी धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी श्रद्धा और रीति-रिवाजों के साथ संपन्न करवाई जाएंगी।
विदित रहे कि, सदियों से यहां यह विश्वास चला आ रहा है कि जब भी सूखा पड़ता है, देवता की विधिवत पूजा और परंपराओं के पालन से बारिश होती है। लेकिन इस बार श्रद्धालुओं की प्रार्थनाओं के बावजूद बारिश नहीं हुई, जिससे चिंता और गहरी हो गई।
सूखे के लंबे दौर और लगातार असफल प्रार्थनाओं के बाद देव परंपराओं के अनुसार बड़ा निर्णय लिया गया। देवता कमेटी, सात गढ़ के लोग, श्रद्धालु और क्षेत्र के बुजुर्गों ने एकत्र होकर इस विषय पर गंभीर मंथन किया।
देव परंपरा के अनुसार यदि लंबे समय तक बारिश न हो और गूर के माध्यम से देवता की कृपा प्राप्त न हो पाए, तो गूर को गद्दी से हटाने का प्रावधान है। इसी परंपरा का पालन करते हुए बड़ा देव कमरूनाग के वर्तमान गूर देवी सिंह को गद्दी से हटा दिया गया।
बड़ा देव कमरुनाग को लेकर क्षेत्र में गहरी धार्मिक मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार कमरूनाग वास्तव में बर्बरीक थे, जो भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र माने जाते हैं। महाभारत युद्ध में उन्होंने हारने वाले पक्ष की ओर से युद्ध लड़ने का प्रण लिया था।
उनकी अपार शक्ति को देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धरकर उनसे उनका शीश दान में मांग लिया, ताकि युद्ध का संतुलन बना रहे। बर्बरीक की इच्छा के अनुसार उनके कटे हुए शीश को एक ऊंचे पर्वत शिखर पर स्थापित किया गया, जिसे आज कमरूनाग पहाड़ी के नाम से जाना जाता है।
स्थानीय लोग उन्हें बड़े देव के नाम से पूजते हैं और अच्छी फसल, समय पर वर्षा और समृद्धि के लिए उनकी आराधना करते हैं। कमरूनाग मंदिर के पास स्थित पवित्र झील भी आस्था का बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि पांडवों ने इस स्थान का निर्माण किया था। श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर इस झील में सोने-चांदी के गहने और सिक्के अर्पित करते हैं, जिन्हें देव संपत्ति माना जाता है।