शिमला। हिमाचल प्रदेश की नगर परिषदों और नगर पंचायतों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राज्य सरकार को इस मामले में बड़ी राहत मिली है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें स्थानीय विधायकों के मतदान अधिकार पर अस्थायी रोक लगाई गई थी। इस फैसले के बाद फिलहाल विधायक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में अपना मत दे सकेंगे।

प्रदेश सरकार ने पहले ही किया था स्पष्ट

दरअसल, राज्य सरकार ने पहले स्पष्ट किया था कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत संबंधित क्षेत्र के विधायक नगर परिषद और नगर पंचायत के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के चुनाव में भाग लेकर मतदान कर सकते हैं।

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इसी स्पष्टीकरण के खिलाफ कई नगर निकायों के निर्वाचित पार्षद अदालत पहुंच गए थे। उनका कहना था कि नगर निकायों के प्रमुख पदों का चुनाव केवल जनता द्वारा चुने गए पार्षदों का अधिकार है और इसमें विधायकों की भागीदारी लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दी थी दलील

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि विधायक परिषद की बैठकों और विकास से जुड़े प्रस्तावों पर मतदान कर सकते हैं, लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे पदों के चुनाव में उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उनका यह भी तर्क था कि जब नामित सदस्य इन चुनावों में मतदान नहीं कर सकते, तो विधायकों को यह विशेष अधिकार देना उचित नहीं है।

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मामले की सुनवाई के बाद हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार के स्पष्टीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि अंतिम फैसला आने तक विधायक इन चुनावों में मतदान नहीं कर पाएंगे। इस आदेश का प्रभाव कई नगर परिषदों और नगर पंचायतों पर पड़ा, जहां अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव लंबित हो गए थे।

चंबा नगर परिषद को लेकर सबसे अधिक चर्चा

सबसे अधिक चर्चा चंबा नगर परिषद को लेकर हुई, जहां विधायक के वोट के आधार पर हुए चुनाव और उसके बाद की प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। हाईकोर्ट ने वहां अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के शपथ ग्रहण, पदभार ग्रहण और संबंधित अधिसूचनाओं पर भी रोक लगा दी थी।

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इसके बाद सुक्खू सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार का पक्ष था कि स्थानीय निकायों से जुड़े कानूनों की सही व्याख्या के अनुसार विधायकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है और उन्हें चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई।

फिलहाल राज्य सरकार को मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद फिलहाल राज्य सरकार को राहत मिली है। हालांकि मामले का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है और भविष्य की सुनवाई में इस मुद्दे पर विस्तृत कानूनी बहस होने की संभावना है।

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