शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रदेश की सुक्खू सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए राज्य में आउटसोर्स भर्तियों पर पूरी तरह से रोक लगाने के ऐतिहासिक आदेश जारी किए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान माननीय अदालत ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई और बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार धन की बचत का बहाना बनाकर बेरोजगारों का शोषण नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि प्रदेश सरकार या उससे जुड़े किसी भी सरकारी उपक्रम (PSUs) में अब कोई भी नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति (R&P) नियमों को ताक पर रखकर नहीं की जाएगी।

सरकार को अदालत की दो टूक

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी.सी. नेगी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि नियमित रिक्तियां उपलब्ध हैं तो उन्हें नियमानुसार भर्ती प्रक्रिया के जरिए भरा जाना चाहिए। केवल खर्च कम करने या प्रशासनिक सुविधा के नाम पर आउटसोर्सिंग का सहारा लेना उचित नहीं माना जा सकता।

 

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स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

मामले की पिछली सुनवाई में अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया था कि स्वास्थ्य विभाग में पहले कर्मचारियों को आउटसोर्स आधार पर नियुक्त किया जाता है और बाद में उन्हें रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) जैसी व्यवस्थाओं में समाहित कर लिया जाता है। अदालत ने इस प्रक्रिया पर भी चिंता व्यक्त करते हुए संकेत दिया कि इससे भर्ती नियमों को दरकिनार करने की आशंका पैदा होती है। कोर्ट ने इसे एक ऐसे "वैकल्पिक रास्ते" के रूप में देखा, जिसका उपयोग नियमित भर्ती प्रक्रिया से बचने के लिए किया जा सकता है।

सरकार से मांगा गया पूरा ब्यौरा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार यह स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ रही कि विभिन्न विभागों और सरकारी संस्थानों में कुल कितने आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं। इस पर अदालत ने नाराजगी जताई और स्वास्थ्य सचिव तथा वित्त सचिव को स्पष्टीकरण के लिए अदालत में उपस्थित रहने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि उसे अब तक यह भी स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि कुल रिक्त पदों के मुकाबले कितनी नियुक्तियां आउटसोर्सिंग के माध्यम से की गई हैं।

 

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17 हजार से अधिक आउटसोर्स कर्मचारी

अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के विभिन्न विभागों, बोर्डों, निगमों और संस्थानों में 17,114 से अधिक लोग आउटसोर्स आधार पर कार्यरत हैं। इनमें कई प्रमुख विभाग और संस्थान शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार पुलिस विभाग, जल शक्ति विभाग, ग्रामीण विकास, कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय, विद्युत निगम तथा चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग में बड़ी संख्या में आउटसोर्स कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं। अदालत ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में आउटसोर्सिंग नियुक्तियों की प्रक्रिया और उसके प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।

अगली सुनवाई 7 जुलाई को

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फिलहाल आउटसोर्स भर्तियों पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं और सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी, जहां सरकार को अदालत के समक्ष विस्तृत जवाब और आवश्यक रिकॉर्ड प्रस्तुत करना होगा। प्रदेश के हजारों बेरोजगार युवाओं और नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों की नजर अब इस मामले पर टिकी हुई है, क्योंकि हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय भविष्य की भर्ती नीतियों और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

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भर्ती व्यवस्था पर क्या पड़ सकता है असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत की टिप्पणियों के आधार पर भविष्य में नीतिगत बदलाव होते हैं, तो नियमित भर्ती प्रक्रिया को अधिक प्राथमिकता मिल सकती है। इससे सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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