शिमला। करीब 25 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार हिमाचल सरकार के लिए शिमला के मशहूर वाइल्ड फ्लावर हॉल होटल से कमाई का रास्ता खुल गया है। होटल के संचालन के लिए हुई ई-नीलामी में सरकार को सालाना कमाई का 47.1 प्रतिशत हिस्सा देने की बोली लगी है। अनुमान है कि अगले 35 साल में इस होटल से प्रदेश सरकार को करीब 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे। आखिर क्या है इस होटल का पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ था विवाद, जानिए इस रिपोर्ट में।
हर महीने सरकारी खजाने में आएंगे 3 करोड़ रुपये
इस समझौते के तहत होटल की कुल सालाना कमाई का 47.1 प्रतिशत हिस्सा हिमाचल सरकार को मिलेगा। इसके अलावा होटल चलाने वाली कंपनी को सरकार को 24 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस के रूप में देने होंगे। कंपनी होटल की संपत्ति पर कम से कम 50 करोड़ रुपये खर्च कर उसे बेहतर बनाएगी। वहीं, सरकार को हर साल मिलने वाली रकम में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी होगी। अनुमान है कि इस होटल से सरकार के खजाने में हर महीने 3 करोड़ रुपये से ज्यादा आएंगे।
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होटल का संचालन करेगी निजी कंपनी
सरकार ने होटल को चलाने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार ई-नीलामी के जरिए देने का फैसला लिया है। इसका मतलब है कि होटल का रोजमर्रा का काम और संचालन लाइसेंस लेने वाली कंपनी करेगी, लेकिन होटल और उससे जुड़ी संपत्तियों का मालिकाना हक हिमाचल सरकार के पास ही रहेगा। सरकार का मानना है कि इससे सरकारी संपत्ति का बेहतर इस्तेमाल होगा और प्रदेश को आर्थिक फायदा मिलेगा।
आखिर क्या था वाइल्ड फ्लावर हॉल का पूरा मामला?
शिमला का वाइल्ड फ्लावर हॉल ब्रिटिश काल की एक ऐतिहासिक इमारत है। साल 1993 में आग लगने से यह इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी। इसके बाद सरकार ने होटल को दोबारा विकसित करने के लिए निजी होटल समूहों के साथ मिलकर काम करने का फैसला लिया।
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साल 1995 में सरकार ने ईआईएच (EIH) के साथ समझौता किया। इसके तहत यहां पांच सितारा डीलक्स होटल बनाना और उसका संचालन करना था। लेकिन साल 1998 में दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया। सरकार का आरोप था कि कंपनी ने तय समय में होटल को पूरी तरह व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं किया और समझौते की कई शर्तों का पालन भी नहीं किया।
सरकार ने समझौता खत्म कर होटल पर लिया कब्जा
विवाद बढ़ने के बाद प्रदेश सरकार ने कंपनी के साथ किया गया समझौता खत्म करने का फैसला लिया। इसके बाद होटल परिसर में कंपनी के कार्यालय को सील करने और संपत्ति का कब्जा लेने की कार्रवाई की गई। हालांकि, कंपनी ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला कंपनी लॉ बोर्ड, मध्यस्थता और अलग-अलग अदालतों तक पहुंच गया। इस तरह होटल को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई।
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2024 से 2025 के बीच सरकार को मिली बड़ी राहत
लंबे समय तक चले इस विवाद में साल 2024 में होटल का कब्जा वापस लेने का रास्ता साफ हुआ। इसके बाद अक्टूबर 2025 में संयुक्त उद्यम कंपनी की संपत्तियों पर सरकार के एकमात्र मालिकाना हक को लेकर महत्वपूर्ण फैसला आया। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ईआईएच और संबंधित पक्षों को वाइल्ड फ्लावर हॉल खाली करने के निर्देश दिए। इसके बाद होटल पर प्रदेश सरकार का नियंत्रण वापस मिलने का रास्ता साफ हो गया।
सरकार को मिल चुके हैं करीब 400 करोड़ रुपये
वाइल्ड फ्लावर हॉल को लेकर चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद प्रदेश सरकार को होटल की जमीन, संपत्ति और उससे जुड़ी दूसरी परिसंपत्तियों पर पूरा मालिकाना हक और नियंत्रण मिल गया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सरकार को करीब 400 करोड़ रुपये की नकद राशि भी मिली है। अब होटल के संचालन के लिए हुई नई ई-नीलामी से सरकार को आने वाले 35 साल तक कमाई होने की उम्मीद है।
