#विविध

October 27, 2026

हिमाचल की इन दो बड़ी रेललाइन के लिए सुक्खू सरकार नहीं देगी पैसा, केंद्र को पत्र लिख बताई 4 वजह

सुक्खू सरकार ने केंद्र को पत्र लिख कर बताए चार बड़े कारण

शेयर करें:

Himachal Pradesh Rail Projects

शिमला। हिमाचल प्रदेश में रेल विस्तार की राह में अब आर्थिक संकट बड़ी बाधा बनता नजर आ रहा है। पर्यटन की दृष्टि से हो या व्यापार और उद्योगों को बढ़ावा देने की बात, राज्य में रेल नेटवर्क का विस्तार लंबे समय से अहम माना जाता रहा है। लेकिन प्रदेश की कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच अब दो प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिए पैसों का इंतजाम करना सरकार के सामने चुनौती बन गया है। हिमाचल सरकार ने चंडीगढ़-बद्दी और कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन के निर्माण के लिए राज्य की ओर से वित्तीय योगदान देने पर असहमति जताई है। सरकार ने इस संबंध में केंद्र को पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है और दोनों परियोजनाओं के खर्च को लेकर अलग-अलग तर्क पेश किए हैं।

2300 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी पर सरकार ने खड़े किए हाथ

दोनों रेल परियोजनाओं के लिए हिमाचल प्रदेश को करीब 2,300 करोड़ रुपये खर्च करने थे। इसमें कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन के लिए लगभग 2,000 करोड़ रुपये और चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन के लिए करीब 300 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी शामिल बताई गई है। राज्य सरकार का कहना है कि मौजूदा वित्तीय परिस्थितियों में इतनी बड़ी राशि का प्रबंध करना आसान नहीं है। सरकार चाहती है कि केंद्र इन परियोजनाओं के वित्तपोषण की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले, ताकि निर्माण कार्य राज्य के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना आगे बढ़ सके।

 

यह भी पढ़ें : कुल्लू दशहरा: CM सुक्खू ने की बड़ी घोषणाएं, देवी-देवताओं के नजराने - बजंतरियों के भत्तों में की भारी बढ़ोतरी

केंद्र को पत्र लिखकर बताईं चार प्रमुख वजहें

हिमाचल सरकार ने रेल परियोजनाओं में आर्थिक हिस्सेदारी से पीछे हटने के अपने फैसले के समर्थन में चार प्रमुख आधार रखे हैं। इनमें प्रदेश पर बढ़ता कर्ज, परियोजनाओं की लागत में भारी वृद्धि, पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण की अधिक लागत और चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन से मिलने वाले क्षेत्रीय लाभ का असमान वितरण शामिल है। सरकार का तर्क है कि परियोजनाओं की शुरुआती लागत के मुकाबले अब खर्च काफी बढ़ चुका है। ऐसे में राज्य की ओर से निर्धारित हिस्सेदारी देना विकास कार्यों और बजट संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन का अधिक हिस्सा हिमाचल से बाहर

चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन को लेकर हिमाचल सरकार ने क्षेत्रीय लाभ और वित्तीय हिस्सेदारी का मुद्दा उठाया है। सरकार के अनुसार, इस रेललाइन की कुल लंबाई करीब 31.14 किलोमीटर है, लेकिन हिमाचल प्रदेश की सीमा में इसका केवल लगभग तीन किलोमीटर हिस्सा आता है। बाकी करीब 28 किलोमीटर ट्रैक पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ क्षेत्र से होकर गुजरेगा।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल: दिवाली की खुशियां हुई दोगुनी, 5 दिन की मिलेगी छुट्टी, महिलाओं को एक एक्स्ट्रा अवकाश

 

ऐसे में राज्य सरकार का सवाल है कि जब रेललाइन का अधिकांश हिस्सा प्रदेश से बाहर है, तो इसके निर्माण का बड़ा वित्तीय बोझ हिमाचल क्यों उठाए? सरकार ने मांग की है कि केंद्र पूरी लागत वहन करे। वैकल्पिक तौर पर 50:50 की हिस्सेदारी को बदलकर 90:10 किया जाए, जिसमें 90 प्रतिशत खर्च केंद्र और 10 प्रतिशत हिमाचल उठाए। एक अन्य विकल्प के रूप में राज्य की हिस्सेदारी हिमाचल की सीमा में बनने वाले ट्रैक की लंबाई के अनुपात में निर्धारित करने की मांग की गई है।

कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन को राष्ट्रीय परियोजना बनाने की मांग

कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन के मामले में हिमाचल सरकार का रुख अलग है। सरकार चाहती है कि इस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित किया जाए और इसके निर्माण का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाए। प्रदेश सरकार का तर्क है कि इस रेललाइन का महत्व केवल यात्रियों की आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में सामरिक दृष्टि से भी यह अहम साबित हो सकती है। प्रस्तावित बिलासपुर-मनाली-लेह रेल संपर्क के संदर्भ में भी इस मार्ग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि यदि रेललाइन का निर्माण राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, तो इसका वित्तीय दायित्व भी केंद्र को उठाना चाहिए।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल की राजधानी में लगा लंबा जाम, कई घंटों तक फंसी रही AMBULANCE- रॉंग पार्किंग ने किया परेशान

एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज बना बड़ी चिंता

प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की वित्तीय स्थिति है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हिमाचल पर एक लाख चार हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज और पुरानी देनदारियों का बोझ है। सरकार का कहना है कि ऐसी स्थिति में हजारों करोड़ रुपये की अतिरिक्त प्रतिबद्धता निभाना मुश्किल है। राज्य का तर्क है कि रेल परियोजनाओं के लिए शुरुआती अनुमान के आधार पर तय की गई हिस्सेदारी और मौजूदा लागत के बीच बड़ा अंतर आ चुका है। यदि हिमाचल को बढ़ी हुई लागत का 25 या 50 प्रतिशत हिस्सा देना पड़ता है, तो इसका असर अन्य विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध बजट पर भी पड़ सकता है।

पहाड़ों में रेललाइन बनाना मैदानी इलाकों से कई गुना महंगा

हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियां रेल परियोजनाओं के निर्माण को जटिल बनाती हैं। पहाड़ों में सुरंगें बनाने, बड़े पुल तैयार करने, जमीन अधिग्रहित करने और भूस्खलन से सुरक्षा के इंतजाम करने पर भारी खर्च आता है। सरकार का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्रति किलोमीटर रेल निर्माण की लागत मैदानी इलाकों की तुलना में चार से पांच गुना तक अधिक हो सकती है। इसी आधार पर प्रदेश सरकार चाहती है कि इन परियोजनाओं का आर्थिक बोझ केंद्र सरकार अधिक व्यापक स्तर पर उठाए। राज्य का मानना है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बढ़ी लागत का पूरा दबाव सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी राज्य पर डालना व्यावहारिक नहीं है।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल : सुबह से फाइल मांगती रही महिला- नायब तहसीलदार लेते रहे चाय-बिस्कुट के मजे, वीडियो में खुली पोल

इन रेल परियोजनाओं का दिया उदाहरण

हिमाचल सरकार ने अपनी मांग के समर्थन में उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना जैसे उदाहरणों का हवाला दिया है। राज्य का तर्क है कि सामरिक और राष्ट्रीय महत्व वाली रेल परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार को पूरा वित्तीय सहयोग देने की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। सरकार के मुताबिक, कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने से राज्य पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ समाप्त हो सकता है और निर्माण कार्य केंद्रीय पूंजीगत बजट के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार को लेना होगा।

सीएम सुक्खू बोले- खर्च का न्यायसंगत बंटवारा हो

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का कहना है कि हिमाचल प्रदेश पहले से ही आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। सरकार रेल विस्तार के खिलाफ नहीं है, लेकिन परियोजनाओं के खर्च का बंटवारा न्यायसंगत होना चाहिए। मुख्यमंत्री के अनुसार, चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन का अधिकांश हिस्सा हिमाचल से बाहर होने के बावजूद राज्य पर बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी डालना उचित नहीं है। वहीं, कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन को उन्होंने देश की सामरिक जरूरतों से जोड़ते हुए इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने और केंद्र से पूरा खर्च उठाने की मांग की है।

 

यह भी पढ़ें : सीएम सुक्खू का बड़ा ऐलान: अब इन्हें भी घर निर्माण को मिलेंगे 3 लाख, शुरू की वाल्मीकि आवास योजना

जयराम ठाकुर ने सरकार के फैसले पर उठाए सवाल

दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने राज्य सरकार के फैसले की आलोचना की है। उनका आरोप है कि सरकार अपनी वित्तीय नाकामियों का हवाला देकर महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के लिए धन देने से पीछे हट रही है। जयराम ठाकुर के अनुसार, चंडीगढ़-बद्दी रेललाइन औद्योगिक क्षेत्र बीबीएन के लिए महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यदि इस परियोजना में देरी होती है, तो इसका असर उद्योगों और रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है। हालांकि, परियोजना के भविष्य और वित्तीय व्यवस्था को लेकर अंतिम स्थिति केंद्र और राज्य के बीच होने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगी।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल : महज 3 हजार रुपये के लिए कर दी मिस्त्री की ह**त्या, पुलिस ने बिहार से दबोचा आरोपी

रेल विस्तार से पर्यटन और उद्योगों को मिल सकती है गति

हिमाचल प्रदेश में रेल नेटवर्क का विस्तार पर्यटन, व्यापार और औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। बेहतर रेल संपर्क से यात्रियों को सुविधा मिल सकती है, माल ढुलाई के विकल्प बढ़ सकते हैं और औद्योगिक क्षेत्रों की कनेक्टिविटी में सुधार हो सकता है। वहीं, बिलासपुर और आसपास के क्षेत्रों में रेल संपर्क मजबूत होने से भविष्य की परिवहन योजनाओं को भी लाभ मिल सकता है।

अब केंद्र के फैसले पर टिकी नजरें

चंडीगढ़-बद्दी और कीरतपुर-बिलासपुर-बैरी रेललाइन का भविष्य अब काफी हद तक केंद्र और राज्य सरकार के बीच वित्तीय सहमति पर निर्भर करेगा। यदि केंद्र हिमाचल की मांग स्वीकार करता है, तो परियोजनाओं के खर्च का मौजूदा ढांचा बदल सकता है। वहीं, यदि राज्य की हिस्सेदारी बरकरार रहती है, तो सरकार को अपने सीमित बजट में इसके लिए धन की व्यवस्था करनी होगी।

नोट : ऐसी ही तेज़, सटीक और ज़मीनी खबरों से जुड़े रहने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर हमारे फेसबुक पेज को फॉलो करें

ट्रेंडिंग न्यूज़
LAUGH CLUB
संबंधित आलेख