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October 30, 2026
सुक्खू सरकार की सुप्रीम कोर्ट में हार : अनुबंध कर्मियों के हक में आया फैसला, चुकाने होंगे 8 हजार करोड़
हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में सुनाया फैसला
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सरकार ने साल 2024 में बनाए गए भर्ती और सेवा शर्तों से जुड़े कानून पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। इस फैसले से प्रदेश के करीब 1.50 लाख कर्मचारियों को राहत मिली है। अब कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी करने वाले कर्मचारियों को नियमों के अनुसार उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से सेवा के लाभ देने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी हिमाचल सरकार की स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) खारिज कर चुका है। उस समय अदालत ने सरकार को चार महीने के भीतर कर्मचारियों के सभी बकाया वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए थे। इसके बावजूद सरकार ने फैसले को दोबारा चुनौती देने के लिए रिव्यू पिटीशन दायर कर दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया है। ऐसे में सरकार को कर्मचारियों को उनका हक देने के लिए अदालत के आदेशों का पालन करना होगा।
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हिमाचल सरकार पहले से ही आर्थिक परेशानी का सामना कर रही है। ऐसे में कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट अवधि के लाभ देने से बचने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की थी। हालांकि, सरकार को यहां से भी राहत नहीं मिली। हिमाचल हाईकोर्ट के एडवोकेट सुरेंद्र वर्मा के मुताबिक, रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद सरकार के पास इस मामले में राहत पाने का कोई दूसरा कानूनी रास्ता नहीं बचा है।
हिमाचल प्रदेश में साल 2003 से कर्मचारियों की भर्ती कॉन्ट्रैक्ट आधार पर की जा रही है। शुरुआत में योग्य कर्मचारियों को आठ साल तक कॉन्ट्रैक्ट पर काम करना पड़ता था। इस दौरान उन्हें नियमित कर्मचारियों के मुकाबले काफी कम वेतन दिया जाता था।
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प्रदेश में अलग-अलग सरकारों ने चुनावी साल में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी की अवधि कम की। पहले आठ साल की अवधि को घटाकर सात साल किया गया। इसके बाद इसे पांच साल, फिर तीन साल और आखिर में दो साल कर दिया गया। इस दौरान कई कर्मचारियों ने मांग उठाई कि उन्हें उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से ही वरिष्ठता और आर्थिक लाभ दिए जाएं। इस मांग को लेकर कर्मचारी हाईकोर्ट भी पहुंचे और कई मामलों में फैसला कर्मचारियों के पक्ष में आया।
कर्मचारियों को पहली नियुक्ति की तारीख से आर्थिक लाभ और वरिष्ठता देने की मांग के बीच कांग्रेस सरकार साल 2024 में नया कानून लेकर आई। इसका नाम 'हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट, 2024' रखा गया।
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इस कानून में कहा गया कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों पर नियमित कर्मचारियों की सेवा से जुड़े नियम लागू नहीं होंगे। यानी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी नियमित कर्मचारियों की तरह पहली नियुक्ति की तारीख से मिलने वाले लाभों का दावा नहीं कर सकेंगे। सरकार ने इस कानून को पिछली तारीखों से लागू किया। इसका मतलब था कि साल 2003 से अब तक कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती हुए कर्मचारी भी इसके दायरे में आ गए।
सरकार के इस कानून को कर्मचारियों ने देवेंद्र कुमार बनाम राज्य सरकार मामले में हिमाचल हाईकोर्ट में चुनौती दी। 25 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया। जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रोमेश वर्मा की बेंच ने 445 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए कानून के उन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया, जिनके जरिए कॉन्ट्रैक्ट अवधि के लाभ रोके जा रहे थे।अदालत ने सरकार को तीन महीने के भीतर कर्मचारियों के बकाया लाभ देने और उनकी वरिष्ठता तय करने के आदेश दिए।
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हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ हिमाचल सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची और स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर की। 29 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज कर दी। साथ ही हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कर्मचारियों को आर्थिक लाभ देने के लिए सरकार को चार महीने का समय दिया।
इस मामले से जुड़ी कुछ याचिकाएं हिमाचल हाईकोर्ट में पहले से लंबित हैं। इन पर भी सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट कर्मचारियों को उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से लाभ देने के आदेश दे रहा है। उम्मीद है कि नवंबर के आखिरी सप्ताह या दिसंबर के पहले सप्ताह तक इस मामले में आगे के आदेश आ सकते हैं। सरकार ने इन आदेशों के पालन से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की थी, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली।
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अदालत के फैसले लागू करना हिमाचल सरकार के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है। अनुमान है कि कॉन्ट्रैक्ट अवधि के दौरान कर्मचारियों को मिलने वाले बकाया सेवा लाभ देने के लिए सरकार को करीब 8,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे प्रदेश के लगभग डेढ़ लाख कर्मचारियों को फायदा होगा।
सरकार पर पहले से ही कर्मचारियों और पेंशनरों के नए वेतनमान के एरियर और दूसरे बकाया लाभों के रूप में करीब 8,000 करोड़ रुपये की देनदारी है। अब अगर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लाभों के लिए अनुमानित 8,000 करोड़ रुपये और खर्च करने पड़ते हैं, तो सरकार पर कुल बकाया राशि का बोझ करीब 16,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
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हाईकोर्ट के एडवोकेट सुरेंद्र वर्मा ने बताया कि हाईकोर्ट पहले ही सरकार के इस कानून को रद्द कर चुका है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से भी सरकार को कोई राहत नहीं मिली है। अब सरकार को अदालत के आदेशों का पालन करना होगा। कर्मचारियों को उनकी पात्रता के अनुसार पहली नियुक्ति की तारीख से मिलने वाले सेवा लाभ देने होंगे।