शिमला। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की सरकार के कार्यकाल में टैक्स को लेकर सियासी चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। कुछ समय पहले 'टॉयलेट टैक्स' का मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में छाया रहा था और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों के चुनावों तक में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था। अब ‘चूल्हा टैक्स’ ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। हिमाचल की पंचायतों में वसूले जाने वाले 'हाउस टैक्स' (प्रॉपर्टी टैक्स) को जब रसीदों पर 'चूल्हा टैक्स' के नाम से लिखा गया, तो यह मामला सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक पर चर्चा का मुख्य विषय बन चुका है।
टॉयलेट टैक्स के बाद चूल्हा टैक्स की चर्चा
हिमाचल प्रदेश में टैक्स से जुड़ा विवाद कोई पहली बार सामने नहीं आया है। करीब दो साल पहले टॉयलेट टैक्स को लेकर प्रदेश में राजनीतिक बहस तेज हुई थी। यह मुद्दा हिमाचल की सीमाओं से बाहर निकलकर हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान भी राजनीतिक भाषणों में उठाया गया था। अब पंचायतों में चूल्हा टैक्स के नाम से सामने आई रसीद ने एक बार फिर प्रदेश की टैक्स व्यवस्था को चर्चा में ला दिया है। हालांकि, मौजूदा मामले में पंचायत अधिकारियों का कहना है कि यह नया कर नहीं, बल्कि प्रॉपर्टी टैक्स की पुरानी व्यवस्था है।
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200 रुपये की रसीद से शुरू हुई बहस
रोहड़ू की शील पंचायत में सालाना 200 रुपये की वसूली वाली रसीद सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर सवाल उठने लगे। रसीद पर ‘चूल्हा टैक्स’ लिखा होने से लोगों में यह जानने की उत्सुकता बढ़ी कि इस नाम से पैसा लेने का आधार क्या है। पंचायत प्रतिनिधियों के अनुसार, यह राशि पहले भी ली जाती रही है, लेकिन अब राशन कार्ड की प्रक्रिया डिजिटल होने के बाद इसकी अलग रसीद काटी जा रही है। इसी बदलाव के कारण पुरानी वसूली अब नए विवाद के रूप में सामने आई है।
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पंचायतों में हाउस टैक्स की व्यवस्था, नाम बना विवाद की वजह
पंचायत अधिकारियों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रॉपर्टी या हाउस टैक्स के रूप में राशि वसूलने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। अलग-अलग पंचायतों में इसकी दर 50, 100 और 200 रुपये सालाना तक बताई जा रही है। कहीं इसे प्रॉपर्टी टैक्स कहा जाता है, तो कहीं चूल्हा टैक्स के नाम से रसीद जारी की जा रही है। इसी नामकरण ने लोगों के बीच भ्रम पैदा किया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब वसूली प्रॉपर्टी टैक्स के तहत हो रही है, तो रसीद पर चूल्हा टैक्स लिखने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
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पंचायत क्यों काट रही रसीद
रोहड़ू के खंड विकास अधिकारी के अनुसार, पहले राशन कार्ड के नवीनीकरण के दौरान ही यह राशि वसूल ली जाती थी। इससे लोगों को अलग से टैक्स देने का एहसास नहीं होता था। अब राशन कार्ड डिजिटल और ऑनलाइन बनने लगे हैं, इसलिए पंचायतों की ओर से प्रॉपर्टी टैक्स की अलग रसीद काटी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि वसूली की व्यवस्था पुरानी है, लेकिन प्रक्रिया में आए बदलाव के कारण मामला सार्वजनिक चर्चा में आ गया है।
ऑडिट में भी उठ चुका है टैक्स वसूली का मुद्दा
अधिकारियों के मुताबिक, जिन पंचायतों में प्रॉपर्टी टैक्स की वसूली नहीं हुई, वहां ऑडिट आपत्तियों में भी इस विषय का उल्लेख सामने आया है। पंचायतों को अपने संसाधन जुटाने और आय के स्रोत मजबूत करने के लिए कहा जाता रहा है। ऐसे में स्थानीय निकायों की आय बढ़ाने के लिए टैक्स वसूली पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, इस व्यवस्था के तहत कितनी पंचायतें टैक्स वसूल रही हैं, कुल कितनी राशि जमा हुई है और किस पंचायत में कितनी वसूली लंबित है, इसका व्यापक आधिकारिक आंकड़ा सामने आना अभी जरूरी है।
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पंचायत सचिव बोले, टैक्स पुराना है
शील पंचायत के सचिव देवेंद्र बख्शी के अनुसार, पंचायत में सालाना 200 रुपये प्रॉपर्टी टैक्स लिया जा रहा है और यह व्यवस्था पहले से चली आ रही है। उनके मुताबिक, रसीद पर चूल्हा टैक्स लिखे होने के कारण विवाद खड़ा हुआ है। पंचायत की ओर से इसे नई वसूली के बजाय पुरानी व्यवस्था का हिस्सा बताया जा रहा है। अब इस मामले में रसीद की भाषा और कर की वास्तविक श्रेणी को स्पष्ट करना लोगों की शंकाएं दूर करने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
पंचायत प्रधान ने बताया कहां खर्च होगी राशि
शील पंचायत के प्रधान निरंजन ने बताया कि पहले यह राशि राशन कार्ड के नवीनीकरण के दौरान ली जाती थी। अब डिजिटल प्रक्रिया के चलते टैक्स की अलग पर्ची जारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि पंचायत में सेग्रीगेशन प्लांट लगाने की योजना है। इसके संचालन और कूड़े-कचरे के वैज्ञानिक तरीके से निपटान के लिए यह राशि ली जा रही है। पंचायत के इस स्पष्टीकरण के बाद अब यह सवाल भी अहम हो गया है कि टैक्स से जुटाई गई राशि का वास्तविक खर्च किस तरह दर्ज किया जाता है और इसकी जानकारी आम लोगों को कैसे उपलब्ध कराई जाती है।
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हिसाब-किताब सार्वजनिक करने की मांग
शील पंचायत के निवासी हरीश चौहान ने टैक्स की रसीद मिलने के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठाए। उन्होंने ग्रामीण परिवारों से वसूली गई राशि के इस्तेमाल और उसके हिसाब-किताब को सार्वजनिक करने की मांग की। उनका सवाल है कि जब कई गांवों में रास्तों और गलियों की हालत खराब है तथा स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं, तो पंचायत की आय का उपयोग कहां किया जा रहा है। उन्होंने टैक्स का कानूनी आधार स्पष्ट करने, अलग-अलग पंचायतों में लागू दरों की जानकारी देने, सालाना आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक करने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत देने पर विचार करने की मांग भी उठाई है।
सुक्खू सरकार के लिए पारदर्शिता का सवाल
चूल्हा टैक्स का मामला ऐसे समय चर्चा में आया है, जब हिमाचल में टैक्स और सरकारी शुल्क से जुड़े मुद्दे पहले भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, शील पंचायत में सामने आई वसूली को सीधे राज्य सरकार की ओर से लगाए गए किसी नए टैक्स के रूप में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि पंचायत अधिकारियों के अनुसार यह प्रॉपर्टी टैक्स की पुरानी व्यवस्था है। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों में कर वसूली की प्रक्रिया, उसके नाम और आय-व्यय की पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल राज्य सरकार और संबंधित विभागों के लिए स्पष्टीकरण देने का आधार बन सकते हैं।
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राजनीतिक मुद्दा बनने की कितनी गुंजाइश?
हिमाचल में टॉयलेट टैक्स का मुद्दा पहले राजनीतिक मंचों तक पहुंच चुका है। अब चूल्हा टैक्स की रसीद सामने आने के बाद ग्रामीणों के सवालों को लेकर राजनीतिक चर्चा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विपक्ष इस मामले में पंचायतों की वसूली, सरकार की निगरानी और ग्रामीण सुविधाओं पर खर्च जैसे मुद्दे उठा सकता है। वहीं, वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पंचायतवार नियमों, टैक्स की दरों और खर्च के विवरण का सार्वजनिक होना जरूरी है। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि प्रदेश की कितनी पंचायतों में चूल्हा टैक्स के नाम से रसीद जारी की जाती है।
