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August 27, 2025
हिमाचल में स्क्रब टायफस की दस्तक, IGMC से आई दुखद खबर- 56 मरीज...
इलाज ना करवाया जाए तो भ्रम से लेकर कोमा तक की समस्या महसूस होने लगती है
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में एक तरफ बारिश कहर बरपा रही है। वहीं, दूसरी तरफ जानलेवा संक्रमण स्क्रब टायफस ने एक बार फिर से हिमाचल में दस्तक दे दी है। राजधानी शिमला स्थित प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल यानी कि IGMC से एक पीड़ित मरीज की मौत होने की खबर सामने आई है।
आपको बता दें कि इस मानसून सीजन के शुरू होने के बाद से IGMC में स्क्रब टायफस के कारण हुई मौत का ये दूसरा मामला है। IGMC के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राहुल राव ने इस दुखद खबर की पुष्टि की।
IGMC अस्पताल की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक अस्पताल में स्क्रब टायफस के कुल 56 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। ऐसे मामलों का आना प्रदेश के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने लोगों से सतर्क रहने की अपील की है।
ताजा मामले में जिस महिला की स्क्रब टायफस के कारण मौत हुई है- वो कुमारसैन के भरेरी धार गांव की रहने वाली थी। मृतका की पहचान 74 वर्षीय चंपा देवी के रूप में हुई है। चंपा देवी को बीती 22 अगस्त को गंभीर हालत में IGMC में उपचार के लिए भर्ती करवाया गया था।
बताया जा रहा है कि चंपा को मेडिसिन वार्ड के ICU में दाखिल किया गया था। चंपा के टेस्ट की जांच में पता चला कि उसे सैप्सिस मल्टी ऑर्गन डिस्फंक्शन सिंड्रोम है और स्क्रब टायफस भी पॉजिटिव आया। डॉक्टरों ने उसे ठीक करने की पूरी कोशिश की, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। 25 अगस्त शाम को इलाज के दौरान चंपा के दिल ने धड़कना बंद कर दिया और उसकी मौत हो गई।
अगर आप इस स्क्रब टायफस नाम की जानलेवा बीमारी से बचना चाहते हैं तो यह लेख आपके लिए बेहद जरूरी है। आज हम आपको बताएंगे कि यह बीमारी कैसे फैलती है, इसके लक्षण क्या है और इसका इलाज क्या है।
स्क्रब टायफस के लक्षण डेंगू फीवर से मिलते-जुलते हैं- मगर जांच में ना तो डेंगू निकलता है और ना ही टाइफाइड फीवर। इस बीमारी से कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है। यह बीमारी एक जानलेवा बीमारी होती है। स्क्रब टाइफस फीवर को बुश टाइफस भी कहा जाता है। आमतौर पर तेज बुखार के साथ होने वाली यह संक्रामक बीमारी झाड़ियों (स्क्रब) में पाए जाने वाले माइट (चींचड़ा) के काटने से फैलती है। इसलिए इस बीमारी का नाम स्क्रब टाइफस पड़ा है।
यह बीमारी बैक्टीरिया से संक्रमित पिस्सु के काटने पर फैलती है। इसके बाद यह स्क्रब टाइफस बुखार बन जाता है। शुरुआत में इस बीमारी का सिर्फ किसान-बागवान की शिकार हुए हैं। मगर अब यह बीमारी फैल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों और झाड़ियों में रहने वाले चूहों पर चिगर्स कीट पाया जाता है। अगल इन संक्रमित चिगर्स या चूहों का पिस्सू काट ले तो ओरेंशिया सुसुगेमोसी बैक्टीरिया व्यक्ति के खून में प्रवेश कर व्यक्ति को संक्रमित कर देता है।
इस बीमारी के लक्षण पिस्सु के काटने के दस दिन बाद दिखने शुरू होते हैं। स्क्रब टाइफस से संक्रमित व्यक्ति को
ऐसे में अगर इसका समय पर इलाज ना करवाया जाए तो भ्रम से लेकर कोमा तक की समस्या महसूस होने लगती है। कभी-कभी कुछ लोगों के ऑर्गन फेल होने के साथ-साथ इंटरनल ब्लीडिंग होने लग जाती है।
स्क्रब टाइफस की जांच के लिए एंजाइम लिंक्ड इम्यूनोसोरबेंट यानी एलीजा टेस्ट किया जाता है। यह टेस्ट IGG और IGM की जानकारी अलग से देता है। इसमें मरीज का ब्लड सैंपल लेकर एंटीबॉडीज का पता किया जाता है। स्क्रब टाइफस की जांच की एक किट की कीमत करीब 18 हजार से 20 हजार रुपए तक होती है। एक किट के जरिए 70 से 75 टेस्ट किए जाते हैं।
आमतौर पर डॉक्टर्स बीमारी की गंभीरता को कम करने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं देते हैं। मगर फिलहाल स्क्रब टाइफस से बचाव के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बनाई गई है। स्क्रब टाइफस से बचाव ही सबसे अच्छा इलाज है।