#विविध
January 25, 2026
हिमाचल : बच्चियों को बचाने के लिए चलती ट्रेन के आगे कूदा रितिक, गंवाई टांग- कल मिलेगा बड़ा सम्मान
खेलते-खेलते पटरी पर पहुंची गई थी दो मासूम बच्चियां
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शिमला। जब सामने मौत खड़ी हो और पीछे हटने का पूरा मौका हो, तब भी कोई इंसान अगर अपनी जान की परवाह किए बिना आगे बढ़ जाए- तो वह सिर्फ बहादुर नहीं, बल्कि इंसानियत की मिसाल बन जाता है।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के चौपाल उपमंडल से ताल्लुक रखने वाले 25 वर्षीय रीतिक चौहान ने ठीक ऐसा ही कर दिखाया। एक ऐसा फैसला, जिसने दो मासूम जिंदगियों को तो बचा लिया, लेकिन खुद रीतिक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
8 अप्रैल 2024 की वह दोपहर शायद बाकी दिनों जैसी ही लग रही थी। मगर सोलन के पास कालका-शिमला रेलवे ट्रैक पर कुछ ऐसा घटा, जिसने रीतिक को आम युवक से असाधारण नायक बना दिया।
बिलासपुर जिले की दो छोटी बच्चियां रेलवे ट्रैक के पास खेलते-खेलते पटरी पर पहुंच गईं। उम्र इतनी कम कि खतरे का अंदाजा नहीं था। इसी दौरान ट्रैक पर तेज रफ्तार ट्रेन आती दिखाई दी। इंजन की आवाज और सीटी ने माहौल को दहशत से भर दिया।
बच्चियां घबरा गईं और डर के मारे वहीं जमकर खड़ी रह गईं। उस पल वहां मौजूद लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले रीतिक ने हालात भांप लिए। रीतिक के पास पीछे हटने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने एक सेकेंड में फैसला किया या तो अपनी जान की परवाह न करते हुए बच्चियों को बचाया जाए या फिर आंखों के सामने दो मासूम जिंदगियां खत्म होती देखी जाएं।
उन्होंने दौड़ लगाई, दोनों बच्चियों को पूरी ताकत से ट्रैक से बाहर धकेला।
बच्चियां सुरक्षित दूर जा गिरीं, लेकिन उसी संघर्ष में ट्रेन रीतिक को अपनी चपेट में ले चुकी थी। रीतिक को गंभीर हालत में PGI चंडीगढ़ ले जाया गया। डॉक्टरों ने हरसंभव कोशिश की, लेकिन संक्रमण और गंभीर चोट के चलते उन्हें घुटने के नीचे से पैर काटने का कठिन फैसला लेना पड़ा।
जिस उम्र में लोग सपने बुनते हैं, उस उम्र में रीतिक को कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखना पड़ा। आज वह बैसाखी के बिना चल तो लेते हैं, लेकिन दर्द सिर्फ शारीरिक नहीं है-वह मानसिक भी है। फिर भी, उनके चेहरे पर कभी यह अफसोस नहीं दिखता कि उन्होंने यह कुर्बानी क्यों दी।
रीतिक साफ कहते हैं किअगर उस दिन मैं पीछे हट जाता, तो जिंदगी भर खुद से नजरें नहीं मिला पाता। मेरी एक टांग गई है, लेकिन दो घरों की खुशियां बच गईं। यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। उनकी यही सोच उन्हें आम इंसान से अलग बनाती है।
रीतिक की इसी निस्वार्थ वीरता को सम्मान देने के लिए हिमाचल सरकार ने उन्हें राज्यस्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह में जीवनरक्षक पदक से सम्मानित करने का फैसला लिया है। शिमला में आयोजित मुख्य समारोह में राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू संयुक्त रूप से यह सम्मान प्रदान करेंगे। खास बात यह है कि इस वर्ष राज्य स्तर पर इस श्रेणी में रीतिक अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिनका चयन किया गया है।
रीतिक चौहान का कहना है कि उन्हें हर दिन कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मुझे सरकार से न्योता को मिला है, लेकिन बर्फबारी के कारण रास्ते बंद पड़े हैं। ऐसे में अपने गांव गागना (ननाहर पंचायत), चौपाल से निकलकर शिमला पहुंच पाना मुश्किल लग रहा है।
रीतिक ने बताया कि वो सोलन में एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। मगर हादसे के बाद से वो बेरोजगार हैं। हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी और उनकी नौकरी भी छूट गई। रितिक का कहना है कि उन्हें इस बात का बिलकुल भी मलाल नहीं है कि उन्होंने किसी दूसरे के लिए अपनी टांग खो दी। उन्हें गर्व है खुद पर कि उन्होंने दो लोगों की जान बचाई है।
रीतिक चौहान की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है-एक ऐसा सच, जो बताता है कि असली बहादुरी हथियारों से नहीं, बल्कि सही वक्त पर लिए गए फैसलों से जन्म लेती है।