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January 6, 2026
बेटे ने निभाया अपना धर्म : 98 साल के पिता को पीठ पर उठाकर करवाए बाबा बालक नाथ के दर्शन
एक-एक कदम श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया
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ऊना। आज के दौर में जब रिश्तों की गर्माहट भागदौड़ और स्वार्थ के बोझ तले दबती जा रही है। उसी समय हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले से एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने इंसानियत, संस्कार और पुत्र धर्म की गहरी छाप समाज पर छोड़ी है।
गगरेट उपमंडल के गांव लुहारली निवासी कुलजस राय ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों और दिल में माता-पिता के लिए सच्चा सम्मान हो- तो उम्र, बीमारी और परिस्थितियां भी आस्था के रास्ते में दीवार नहीं बन सकतीं।
कुलजस राय अपने 98 वर्षीय पिता गुरदास राम को पीठ पर उठाकर बाबा बालक नाथ की तपोस्थली शाहतलाई पहुंचे। यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। गुरदास राम इस उम्र में चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
शरीर ने साथ छोड़ दिया है, लेकिन मन में वर्षों से एक ही इच्छा पल रही थी- बाबा बालक नाथ के दर्शन। उम्र और स्वास्थ्य इस इच्छा के बीच बड़ी बाधा बनकर खड़े थे, लेकिन बेटे कुलजस राय ने तय कर लिया कि पिता की यह अंतिम इच्छा अधूरी नहीं रहेगी।
शाहतलाई तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। भीड़, चढ़ाई और लंबी दूरी हर किसी के लिए चुनौती होती है। ऐसे में 98 वर्षीय बुजुर्ग को दर्शन करवाना किसी परीक्षा से कम नहीं था। मगर कुलजस राय ने न थकान की परवाह की, न लोगों की भीड़ की।
पिता को पीठ पर उठाकर उन्होंने एक-एक कदम श्रद्धा और संकल्प के साथ आगे बढ़ाया। रास्ते भर उनकी आंखों में थकावट जरूर थी, लेकिन चेहरे पर संतोष और भक्ति साफ झलक रही थी।
जब कुलजस राय अपने पिता को पीठ पर उठाए बाबा बालक नाथ के दरबार में पहुंचे, तो यह दृश्य वहां मौजूद श्रद्धालुओं के लिए भावुक कर देने वाला था। कई लोग पलभर के लिए ठहर गए, कुछ की आंखें नम हो गईं।
हर कोई इस बेटे के त्याग और प्रेम को नमन करता नजर आया। बाबा जी के चरणों में शीश नवाते समय गुरदास राम के चेहरे पर जो सुकून और संतोष था, वह वर्षों की तपस्या के फल जैसा प्रतीत हो रहा था।
कुलजस राय के भाई गुलशन राय ने बताया कि उनके पिता काफी समय से बाबा बालक नाथ के दर्शन की बात करते रहते थे। उम्र और कमजोर स्वास्थ्य के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था, लेकिन परिवार ने मिलकर यह निर्णय लिया कि पिता की इस इच्छा को पूरा करना ही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है।
इसी भावना के तहत कुलजस राय ने स्वयं आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी संभाली और अपने कर्म से समाज को एक मजबूत संदेश दे दिया। आज के समय में जब कई बुजुर्ग अपने ही बच्चों से उपेक्षा का दर्द झेल रहे हैं, जब माता-पिता को वृद्ध आश्रम छोड़ देना आसान समझा जाने लगा है- ऐसे माहौल में कुलजस राय का यह कदम समाज के लिए आईना है।
शाहतलाई पहुंचे श्रद्धालुओं ने कुलजस राय की खुले दिल से सराहना की। लोगों ने इसे सच्ची श्रद्धा, मजबूत संस्कार और भारतीय संस्कृति की जीवंत तस्वीर बताया। कई लोगों का कहना था कि यह दृश्य केवल बाबा बालक नाथ के दर्शन का नहीं, बल्कि एक बेटे के प्रेम और समर्पण का दर्शन था।
गांव लुहारली के लिए यह घटना गर्व का विषय बन गई है। कुलजस राय ने बिना किसी प्रचार, बिना किसी स्वार्थ के जो किया, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी सीख है। यह कहानी याद दिलाती है कि अगर हम अपने माता-पिता की इच्छाओं को समझें, उनके सम्मान और सेवा को जीवन का आधार बनाएं, तो समाज खुद-ब-खुद बेहतर बन सकता है।