#विविध
August 23, 2026
हिमाचल : घर का काम छोड़ सोशल मीडिया पर बिजी रहती थी पत्नी, कोर्ट ने पति को दिलवाया तलाक
घर की जिम्मेदारी निभाने से किया मना, पति का भी कई बार किया अपमान
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित पारिवारिक न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित करते हुए मानसिक क्रूरता को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल करना या घरेलू कामकाज से दूरी बनाना अपने आप में पति या पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता साबित नहीं करता। मगर जब ऐसे व्यवहार के साथ वैवाहिक जिम्मेदारियों की लगातार अनदेखी, आए दिन विवाद, परिवार के प्रति असम्मान और जीवनसाथी को अपमानित करने जैसी परिस्थितियां भी जुड़ जाएं- तो पूरे मामले का मूल्यांकन मानसिक क्रूरता के आधार पर किया जा सकता है।
अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश धीरू ठाकुर की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर पति की तलाक याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत के इस फैसले को सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और वैवाहिक जीवन के बीच संतुलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत ने माना कि किसी पति या पत्नी को सिर्फ इस आधार पर सोशल मीडिया के इस्तेमाल से नहीं रोका जा सकता कि उसका जीवनसाथी उसकी गतिविधियों से सहमत नहीं है। सोशल मीडिया आज लोगों के जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुका है और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद और स्वतंत्रता के अनुसार इसका उपयोग करने का अधिकार है।
इसलिए सिर्फ अधिक समय तक मोबाइल फोन चलाना, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहना या ऑनलाइन बातचीत करना- अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक वैवाहिक विवाद के तथ्यों और परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाता है।
अगर सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने का असर पति-पत्नी के रिश्ते पर पड़ने लगे, घरेलू और वैवाहिक जिम्मेदारियां प्रभावित हों और इसके साथ लगातार झगड़े तथा जीवनसाथी के प्रति तिरस्कारपूर्ण व्यवहार भी सामने आए, तो ऐसी परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला बैजनाथ उपमंडल के एक निवासी द्वारा वर्ष 2024 में पालमपुर पारिवारिक न्यायालय में दायर की गई तलाक याचिका से जुड़ा है। पति ने अदालत के समक्ष अपने वैवाहिक जीवन से संबंधित कई आरोप रखे।
याचिका के अनुसार, शादी के कुछ वर्षों बाद पत्नी के व्यवहार में बदलाव आने लगा। पति का आरोप था कि मार्च 2017 के आसपास पत्नी सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने लगी। इसके कारण पारिवारिक जीवन और पति-पत्नी के रिश्ते पर भी असर पड़ने लगा।
पति ने यह भी कहा कि पत्नी ससुराल में रहने और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए तैयार नहीं थी। आरोपों के अनुसार, समय बीतने के साथ पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ते चले गए और रिश्ते में तनाव लगातार बना रहा।
पति ने अदालत में आरोप लगाया कि पत्नी का व्यवहार केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित विवाद का विषय नहीं था, बल्कि उसे व्यक्तिगत रूप से भी बार-बार अपमानित किया जाता था। पति के अनुसार, पत्नी उसे अनाकर्षक और कमतर बताती थी, जिससे उसे मानसिक पीड़ा होती थी।
याचिका में परिवार के अन्य सदस्यों और रिश्तेदारों के साथ भी पत्नी के कथित दुर्व्यवहार का उल्लेख किया गया। पति का कहना था कि परिवार में तनाव बढ़ने के कारण रिश्ते को सामान्य करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए गए।
परिवार के लोगों ने पति-पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश की। इसके अलावा पंचायत स्तर पर भी मामले को सुलझाने और दोनों के बीच मतभेद दूर करने के प्रयास किए गए, लेकिन पति के अनुसार कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
मामले की सुनवाई के दौरान पारिवारिक न्यायालय की ओर से पत्नी को नोटिस जारी किए गए। इसके बावजूद वह अदालत में उपस्थित नहीं हुई और न ही पति की ओर से लगाए गए आरोपों का अदालत के समक्ष प्रभावी ढंग से जवाब दिया गया।
इसके बाद न्यायालय ने प्रक्रिया के अनुसार पत्नी को एकतरफा घोषित करते हुए मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, पति के बयान और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर मामले का निर्णय किया।
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर अदालत की टिप्पणी भी रही। न्यायालय ने साफ कहा कि केवल खाना बनाने, कपड़े धोने या अन्य घरेलू कार्य करने से इन्कार कर देना अपने आप में मानसिक क्रूरता का आधार नहीं बन सकता।
अदालत ने माना कि विवाह के संबंध में केवल पारंपरिक घरेलू भूमिकाओं के आधार पर किसी व्यक्ति के व्यवहार को क्रूरता नहीं कहा जा सकता। पति या पत्नी का घरेलू काम न करना मात्र, तलाक देने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है।
अगर घरेलू जिम्मेदारियों से दूरी बनाने के साथ विवाह संबंध को आगे न बढ़ाने की मंशा, लगातार झगड़े, परिवार के प्रति असम्मान और जीवनसाथी को अपमानित करने जैसे अन्य तथ्य भी मौजूद हों, तो पूरे व्यवहार का संयुक्त रूप से मूल्यांकन किया जा सकता है।
पारिवारिक विवादों में मानसिक क्रूरता का कोई एक निश्चित पैमाना नहीं होता। हर मामले में पति-पत्नी के बीच संबंधों की प्रकृति, लंबे समय तक चले व्यवहार और उसके दूसरे व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को देखा जाता है।
पालमपुर पारिवारिक न्यायालय ने भी इसी सिद्धांत के आधार पर मामले पर विचार किया। अदालत ने केवल सोशल मीडिया के इस्तेमाल या घरेलू कामकाज से इन्कार को अलग-अलग आधार बनाकर फैसला नहीं किया, बल्कि पति द्वारा बताए गए पूरे घटनाक्रम और परिस्थितियों को एक साथ देखा।
अदालत के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या पत्नी का कथित व्यवहार इतना गंभीर था कि पति के लिए वैवाहिक संबंध को जारी रखना मानसिक रूप से कठिन हो गया। उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों के आधार पर अदालत ने इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना और पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी।