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January 25, 2026

हिमाचल में मनरेगा की पोल खुली : 655 पंचायतों में एक को भी नहीं मिला काम- सरकारी दावों पर सवाल

मनरेगा में ट्रांसजेंडरों के भी बने फर्जी कार्ड

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शिमला। हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण बेरोजगारी से निपटने की सबसे बड़ी योजना मानी जाने वाली मनरेगा की हालत दिसंबर महीने में बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करती नजर आ रही है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट ने राज्य में मनरेगा के क्रियान्वयन पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

655 पंचायतों में एक को भी नहीं मिला काम

रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की 3,616 ग्राम पंचायतों में से 655 पंचायतों में दिसंबर माह के दौरान मनरेगा के तहत एक भी कार्यदिवस का सृजन नहीं हो पाया। यानी इन पंचायतों में पंजीकृत मजदूरों को पूरे महीने काम के लिए बुलाया ही नहीं गया।

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 77 ने खर्च नहीं किया पूरा बजट

इतना ही नहीं, रिपोर्ट यह भी बताती है कि प्रदेश की 77 ग्राम पंचायतों में दिसंबर के दौरान मनरेगा के तहत एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया, जिससे साफ जाहिर होता है कि इन पंचायतों में योजना पूरी तरह ठप रही।

राजधानी शिमला सबसे पीछे

मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में जिला शिमला का प्रदर्शन सबसे कमजोर सामने आया है। आंकड़ों के अनुसार शिमला जिले की 149 ग्राम पंचायतों में दिसंबर माह में एक भी कार्यदिवस सृजित नहीं हुआ। यह स्थिति तब है, जब शिमला जिला प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से प्रदेश का सबसे अहम जिला माना जाता है।

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नहीं मिला कोई काम

शिमला के बाद कांगड़ा जिले की 89 पंचायतें, सोलन की 86, किन्नौर की 67, मंडी की 61, सिरमौर की 53, हमीरपुर की 47, ऊना की 33, चंबा की 26, लाहौल-स्पीति की 25, बिलासपुर की 10 और कुल्लू की 9 पंचायतें ऐसी रहीं, जहां दिसंबर में मनरेगा के तहत कोई भी काम नहीं मिला।

एक रुपया भी खर्च नहीं

मनरेगा में शून्य बजट खर्च करने वाली पंचायतों की सूची भी कम चौंकाने वाली नहीं है। इन 77 पंचायतों में सबसे ज्यादा 15 पंचायतें कांगड़ा जिले की हैं। इसके बाद शिमला की 13, मंडी की 12, सिरमौर की 7, सोलन और हमीरपुर की 6-6 पंचायतें शामिल हैं। चंबा और ऊना में 5-5, किन्नौर में 3, जबकि बिलासपुर और लाहौल-स्पीति में 2-2 पंचायतों में दिसंबर में मनरेगा पर एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ। कुल्लू जिले की भी एक पंचायत इस सूची में शामिल है।

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छह महीनों से लगातार बिगड़ती स्थिति

रिपोर्ट के अनुसार पिछले छह महीनों से लगातार बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतें मनरेगा के तहत कार्यदिवस सृजित करने में नाकाम रही हैं।

  • दिसंबर अकेला महीना नहीं है, जिसने मनरेगा की कमजोर हालत उजागर की हो।
  • नवंबर में 750 पंचायतों में कोई काम नहीं हुआ
  • अक्तूबर में यह संख्या 1,175 तक पहुंच गई
  • सितंबर में 1,015
  • अगस्त में 1,055
  • जुलाई में 623 पंचायतों में एक भी कार्यदिवस सृजित नहीं हो सका

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जनजातीय जिले सबसे ज्यादा प्रभावित

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रदेश के जनजातीय जिले मनरेगा के क्रियान्वयन में सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं। किन्नौर जिले की कुल 73 ग्राम पंचायतों में से 67 पंचायतों में दिसंबर माह में एक भी कार्यदिवस सृजित नहीं हुआ। वहीं लाहौल-स्पीति जिले की 45 पंचायतों में से 25 पंचायतों में मनरेगा पूरी तरह ठप रही।

रोजगार का संकट और गहराया

किन्नौर में दिसंबर के दौरान 3 पंचायतों में और लाहौल-स्पीति में 2 पंचायतों में मनरेगा पर एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया। दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों में मनरेगा का ठप होना वहां के ग्रामीणों के लिए रोजगार संकट को और गहरा कर रहा है।

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ज्यादा पंचायतें, फिर भी बेहतर प्रदर्शन

दिलचस्प बात यह है कि कांगड़ा जिला प्रदेश में सबसे अधिक पंचायतों वाला जिला है, जहां कुल 815 ग्राम पंचायतें हैं। इसके बावजूद दिसंबर में यहां 89 पंचायतों में ही कार्यदिवस सृजित नहीं हो पाए। तुलना करें तो शिमला जिले में कुल 412 पंचायतें हैं, लेकिन यहां 149 पंचायतों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा।

सरकार ने मानी समस्या, जांच के संकेत

ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने जनजातीय क्षेत्रों में मनरेगा के तहत कार्यदिवस सृजित न हो पाने की बात को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि जनजातीय इलाकों में यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन अन्य जिलों में भी मनरेगा के कमजोर प्रदर्शन के कारणों की जांच की जाएगी। सरकार यह पता लगाएगी कि कार्य न होने के पीछे प्रशासनिक लापरवाही है या कोई अन्य तकनीकी और वित्तीय कारण।

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ग्रामीण पर सीधा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की रीढ़ है। बड़ी संख्या में पंचायतों में काम न मिलना यह संकेत देता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले महीनों में पलायन और बेरोजगारी की समस्या और गंभीर हो सकती है।

मनरेगा में 131 ट्रांसजेंडर पंजीकृत

वहीं, रिपोर्ट में ये भी खुलासा हुआ है कि राज्य में मनरेगा के तहत 131 ट्रांसजेंडर पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें से एक को भी न तो रोजगार दिया गया और न ही एक भी कार्य दिवस सृजित हुआ। यह स्थिति न केवल मनरेगा की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाती है, बल्कि सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर संदेह पैदा करती है।

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