#धर्म
January 24, 2026
हिमाचल : –5 डिग्री में भी नहीं डिगी आस्था, बर्फीले तूफान में देवता ने निभाई परंपरा; फिर लौटे वापस
पराशर देव स्थल में एक से डेढ़ फीट तक जमी बर्फ
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मंडी। देवभूमि हिमाचल प्रदेश के लोगों देवी-देवताओं को सर्वोपरि मानते हैं। यहां देवी-देवता केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि समाज के मार्गदर्शक और रक्षक भी माने जाते हैं। गांव-गांव में देव परंपराएं आज भी जीवित हैं और हर सुख-दुख, निर्णय और उत्सव में देव आज्ञा को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।
ऐसा ही कुछ मंडी जिले में पराशर ऋषि की तपोस्थली में देखने को मिला। जहां आसमान से गिरती बर्फ की सफेद चादर, तेज ठंडी हवाएं और उसी बीच देव परंपराओं की अडिग आस्था-पराशर ऋषि की तपोस्थली में ऐसा ही अलौकिक नजारा देखने को मिला, जिसने हर किसी को भाव-विभोर कर दिया।
मंडी जनपद की प्रसिद्ध देवस्थली पराशर ऋषि में इन दिनों देव आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। जनपद के आराध्य देवता देव चंडोही गणपति, लगभग 250 कारदारों और देवलुओं के साथ विशेष पूजा-अनुष्ठान के लिए यहां पहुंचे थे। यह यात्रा कोई साधारण धार्मिक भ्रमण नहीं, बल्कि देव आदेश पर की गई परंपरागत और विधिवत देव यात्रा थी।
शुक्रवार सुबह देव पराशर ऋषि के दरबार में विशेष पूजा-अर्चना का समय निर्धारित था। लेकिन इससे पहले ही सुबह करीब पांच बजे पराशर क्षेत्र में बर्फबारी शुरू हो गई। धीरे-धीरे बर्फबारी तेज होती चली गई और हवाएं भी तूफानी हो उठीं। आम हालात में ऐसे मौसम में लोग घरों से बाहर निकलने से कतराते हैं, लेकिन यहां देव परंपराएं हर कठिनाई से ऊपर नजर आईं।
भीषण ठंड और लगातार गिरती बर्फ के बावजूद कारदारों और देवलुओं ने देव रीति-रिवाजों के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए। हवन-यज्ञ, पूजा-अर्चना और अन्य रस्में पूरे विधि-विधान से संपन्न की गईं। इस दौरान देव पराशर ऋषि के दरबार में मौजूद श्रद्धालुओं की आंखों में आस्था और मन में अपार विश्वास साफ झलक रहा था।
देव चंडोही गणपति औट तहसील की स्नोर घाटी से आते हैं। जिला मुख्यालय से देवता का मूल स्थान करीब 63 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देवता के कारदार सूर्याकांत शर्मा ने बताया कि यह यात्रा देव पराशर ऋषि के विशेष निमंत्रण पर की गई थी। देव आदेशानुसार ही देव चंडोही गणपति अपने कारदारों और देवलुओं के साथ पराशर पहुंचे और वहां विधिवत पूजा-अर्चना की गई।
उन्होंने बताया कि पूजा-अनुष्ठान और हवन-यज्ञ संपन्न होने के बाद देवता अपने साथ आए कारदारों और देवलुओं के साथ बर्फबारी के बीच ही अपने मूल स्थान की ओर लौट गए। यह यात्रा अपने आप में देव आस्था और परंपरा की जीवंत मिसाल बन गई।
इस पूरे दृश्य ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हिमाचल प्रदेश को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता। यहां देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। बर्फ, ठंड और दुर्गम रास्ते भी जब श्रद्धा के सामने छोटे पड़ जाएं, तो वही देवभूमि की पहचान बन जाती है।
पराशर ऋषि मंदिर मंडी जिला मुख्यालय से करीब 56 किलोमीटर दूर स्थित है। समुद्र तल से लगभग 9,000 फीट की ऊंचाई पर बसे इस देवस्थल की पहचान सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां स्थित प्राचीन झील को पराशर झील के नाम से जाना जाता है, जो इस क्षेत्र की सुंदरता और धार्मिक महत्व को और भी बढ़ा देती है।
पुराणों के अनुसार ऋषि पराशर ने इसी स्थान पर कठिन तपस्या की थी, जिसके कारण इस स्थल को विशेष पवित्रता प्राप्त है। मंदिर का निर्माण 13वीं और 14वीं शताब्दी में मंडी रियासत के तत्कालीन राजा बानसेन द्वारा करवाया गया था, जो इसकी ऐतिहासिक विरासत को दर्शाता है।
मंदिर कमेटी अध्यक्ष बलवीर ठाकुर ने बताया कि शुक्रवार सुबह करीब पांच बजे हल्की बर्फबारी शुरू हुई थी, जो कुछ ही समय में तेज हो गई। पूजा-अनुष्ठान के दौरान लगातार बर्फ गिरती रही, लेकिन धार्मिक रस्मों में कोई बाधा नहीं आई। उन्होंने बताया कि फिलहाल पराशर देव स्थल में एक से डेढ़ फीट तक बर्फ जम चुकी है, जिससे पूरा क्षेत्र सफेद चादर में ढका हुआ है।
बर्फबारी के बीच संपन्न हुआ यह देव आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह संदेश छोड़ गया कि हिमाचल की देव परंपराएं मौसम और हालात की मोहताज नहीं होतीं-यहां श्रद्धा हर कठिनाई पर भारी पड़ती है।