धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से एक हैरान करने वाला और चर्चा का विषय बना मामला सामने आया है, जहां एक पति को पूरे छह साल के लंबे और मानसिक संघर्ष के बाद आखिरकार अदालत से इंसाफ मिल गया है। इस पति का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपनी पत्नी के दबाव के आगे झुकते हुए मायके में 'घर जमाई' बनकर रहने से साफ इनकार कर दिया था।
बस इसी एक बात पर उपजा पारिवारिक विवाद ऐसा बढ़ा कि हंसता-खेलता परिवार बिखर गया और मामला अदालत की चौखट तक जा पहुंचा। ज्वालामुखी उपमंडल क्षेत्र से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई देहरा परिवार न्यायालय की अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश सपना पांडेय की अदालत में हुई। अदालत ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद क्रूरता और परित्याग के आधार पर पति की तलाक याचिका को मंजूर करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री जारी कर दी है।
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घर जमाई बनने का बनाया जा रहा था दबाव
मामला ज्वालामुखी उपमंडल क्षेत्र के एक दंपती से जुड़ा है। पति ने परिवार न्यायालय में बताया कि उसका विवाह जनवरी 2015 में ज्वालामुखी के एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। दोनों का एक बेटा भी है। पति के अनुसार शादी के बाद पत्नी उस पर मायके में घर जमाई बनकर रहने का दबाव डालती थी। जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तो वैवाहिक संबंधों में तनाव बढ़ता चला गया। याचिका में पत्नी के व्यवहार को लेकर अन्य आरोप भी लगाए गए।
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2019 में पत्नी छोड़कर चली गई मायके
पति के अनुसार विवाद बढ़ने के बाद जुलाई 2019 में पत्नी उसका घर छोड़कर मायके चली गई। इसके बाद पति ने उसे वापस लाने के लिए व्यक्तिगत रूप से और फोन के माध्यम से कई प्रयास किए, लेकिन पत्नी उसके साथ वापस रहने के लिए तैयार नहीं हुई। इस तरह दोनों के बीच दूरी लगातार बढ़ती गई और उनका वैवाहिक जीवन लंबे समय तक अलगाव में गुजरता रहा।
एसडीएम के सामने भी साथ रहने से किया था इनकार
मामला आगे बढ़ने पर पति की ओर से ज्वालामुखी के एसडीएम के समक्ष भी प्रक्रिया शुरू की गई। अगस्त 2022 में पत्नी एसडीएम के समक्ष पेश हुई। पति के अनुसार, वहां भी पत्नी ने उसके साथ वापस रहने में रुचि नहीं दिखाई। पति ने अदालत के समक्ष पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने से संबंधित आरोप भी लगाए थे, हालांकि अदालत के सामने मुख्य रूप से वैवाहिक विवाद, लंबे समय से अलग रहना और पति के साथ रहने से इनकार किए जाने से जुड़े तथ्यों पर विचार किया गया।
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कोर्ट में पेश नहीं हुई पत्नी
तलाक की याचिका पर सुनवाई के दौरान पत्नी अदालत में पेश नहीं हुई। इसके बाद 24 सितंबर 2024 को उसे एकतरफा कर दिया गया। पति की ओर से अदालत में गवाही और दस्तावेज पेश किए गए, जिनका पत्नी की ओर से प्रतिवाद नहीं किया गया। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाही और दस्तावेजों के आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई।
कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग के आधार माने
मामले की सुनवाई अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय देहरा सपना पांडेय ने की। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद माना कि मामले में क्रूरता और परित्याग के आधार साबित होते हैं। अदालत ने यह भी माना कि दोनों के बीच वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू होने की वास्तविक संभावना नजर नहीं आ रही थी। इन परिस्थितियों के आधार पर पति की तलाक याचिका मंजूर कर ली गई।
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छह साल के इंतजार के बाद विवाह का कानूनी अंत
परिवार न्यायालय के फैसले के साथ वर्ष 2019 से चला आ रहा यह वैवाहिक अलगाव अब कानूनी रूप से भी समाप्त हो गया। पति और पत्नी के बीच लंबे समय से चली आ रही दूरी को अदालत के आदेश ने विवाह विच्छेद का रूप दे दिया। इस मामले में पति की ओर से उठाया गया मुख्य मुद्दा मायके में घर जमाई बनकर रहने से इनकार था। इसके बाद शुरू हुआ विवाद वर्षों तक चला और अंततः परिवार न्यायालय तक पहुंचा।
लंबे अलगाव के बाद आया फैसला
पति-पत्नी के रिश्ते में जब साथ रहने की इच्छा और वैवाहिक अपेक्षाओं के बीच टकराव पैदा हो जाए तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। इस मामले में भी वर्षों तक चला अलगाव आखिरकार अदालत के फैसले तक पहुंचा। देहरा परिवार न्यायालय की डिक्री के बाद अब दोनों के वैवाहिक संबंध का कानूनी रूप से अंत हो गया है।
