सोलन। हिमाचल प्रदेश देवी-देवताओं की भूमि है। यहां पग-पग पर इनसे जुड़ी कई कहानियां सुनने को मिलती हैं। एक ऐसी ही कहानी है भगवान भोलेनाथ की जटाओं से प्रगटे देवता महाराज की।
28 गांवों के कुल इष्ट देवता
शिव गण कहलाने वाले देव गण महाराज बाघल रियासत के 28 गांवों के कुल इष्ट देवता हैं। खास बात है कि इनकी उत्पत्ति का किस्सा सतयुग से जुड़ा है। इन देवता जी को शांत करवाने के लिए मां काली ने इन्हें खुद में समाहित कर लिया था।
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साथ विराजती हैं भद्रकाली
खास बात ये है कि आज भी भद्रकाली रूप में वो इन्हीं के साथ विराजती हैं। मान्यता है कि जब राजा दक्ष ने एक बड़े यज्ञ में भगवान शिव को ना बुलाकर उनका अपमान किया, तब शिव जी ने अपनी जटाओं से एक गण को प्रकट किया।
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6 महीने बाद हो जाती मौत
यहां रहस्यमयी तरीके से उनका हर पुजारी छह महीने से ज्यादा जीवित ही नहीं रह पाता था और उसकी मौत हो जाती थी। ऐसे में राजा ने अलग-अलग गाँवों से पुजारी बुलाए, तरह-तरह के उपाय किए, पर नतीजा वही रहा।
1 साल से ज्यादा निभाई सेवा
फिर यहां अर्की से मां भद्रकाली का एक उपासक आया। उसके पास मां की अष्टभुजा की प्रतिमा थी और उसकी भक्ति अद्भुत मानी जाती थी। ऐसे में राजा ने उसे मौका दिया और चमत्कार ये हुआ कि वही पहला इंसान बना जिसने एक साल से भी ज्यादा देव गण महाराज की सेवा निभाई।
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रियासत में कोई भी जमीन चुनो
राजा उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और कहा “रियासत में कोई भी ज़मीन चुनो और देवता जी को वहां प्रतिष्ठित करो।” पुजारी ने देव गण महाराज को किल्टे में उठाया और चल पड़ा। जहां-जहां रुका, वहां देवता के निशान बने।
उठ ही नहीं पाया था किल्टा
अंत में जब वो दाडलाघाट के पास मां जालपा के स्थान पर पहुंचा तो किल्टा उठ ही नहीं पाया। फिर यहीं देव गण महाराज का स्थायी निवास मान लिया गया और पुजारी को पास का कोटला गांव दान दिया गया।
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मार्च से जून तक होती रथ यात्रा
आज भी उसी वंश के पुजारी देव गण महाराज की सेवा करते हैं। इनके रथ में मां जालपा और मां भद्रकाली अपने-अपने भैरवों सहित विराजती हैं। हर साल मार्च से जून तक देव गण महाराज रथ यात्रा पर निकलते हैं और भक्तों के घर जाकर उनके दुःख हरते हैं, मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
