शिमला। देवभूमि हिमाचल की हर घाटी और हर पहाड़ में एक दिव्य शक्ति का आभास होता है। यहां की नदियां, झरने और वादियां जैसे जीवन की ऊर्जा से भरी हुई हैं। इस धरती पर हर स्थान पर एक विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। देवता यहां की पहाड़ियों, गांवों और खेतों में बसी हैं और लोगों की आस्था की नींव बने हैं।
कहा जाता है भांग का राजा
आज के अपने इस लेख में हम आपको हिमाचल के एक ऐसे देवता साहिब के बारे में बताएंगे- जिन्हें भांग का राजा कहा जाता है। जिन्हें लोगों ने किन्नर कैलाश के जंगलों में भांग के बीज से निकलते देखा और फिर इन्हें कैलाश के उस पार से हिमाचल लाया गया।
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क्षेत्र में फहराते हैं तिरंगा
हम बात कर रहे हैं किन्नौर जिले के देवता कासुराज जी महाराज की- जो गणतंत्र दिवस के दिन अपने क्षेत्र में तिरंगा फहराते हैं।
द्वापर युग से जुड़ा है इतिहास
मान्यता के अनुसार, देवता कासुराज जी का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है। जनश्रुतियों के मुताबिक, पहले किन्नौर के रिब्बा गांव में 12 सावनियों का राज हुआ करता था। वहीं, सावनियों के राज छोड़ने पर गुरुका देवा को इस क्षेत्र की कमान दे दी गई और उन्हें ही पूजा जाने लगा।
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पत्थर में बदल गए
मगर फिर देव गुरुका के राज में वहां के जंगलों में लगे फूल मुरझाने लगे और उखयंग त्योहार के समय देवा गुरुका के कामदार फूल भी नहीं पहुंचा पाए। जिसके बाद देव गुरुका जी- किन्नौर में टेरंग सांतंग स्थान पर पत्थर रूप में बदल गए।
बिना देवता के हो गया क्षेत्र
यानी एक बार फिर रिब्बा क्षेत्र बिना देवता का हो गया। ऐसे में देवताओं और स्थानीय लोगों ने आपस में चर्चा कर कैलाश से पार कांसु कोठी से कासुराज महाराज को बुलाने का फैसला लिया।
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आज भी विराजित हैं असंख्य शक्तियां
इसके बाद देव जाबल नारायण, देव परका शंकरेस जी और देवता ग्यांगमायुम लोहे की पोशाक और लोहे की छड़ी लेकर कैलाश को पार कर कांसु कोठी पहुंचे। जहां स्वर्ण सिहासन पर विराजित कासुराज जी महाराज देवताओं द्वारा मनाने पर रिब्बा आ गए- जहां अपनी असंख्य शक्तियों के साथ वे आज भी विराजित हैं। कहते हैं गांववालों ने उन्हें किन्नर कैलाश के जंगलों में भांग के बीज से बाहर निकलते देखा था।
