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December 17, 2025
हिमाचल के बागवानों को सुप्रीम कोर्ट से राहत- नहीं कटेंगे सेब के बगीचे, HC का फैसला रद्द
लाखों लोगों की रोजी-रोटी और पर्यावरण दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचा
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के सैकड़ों सेब उत्पादकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। शीर्ष अदालत ने वन भूमि पर अतिक्रमण वाले क्षेत्रों से फलदार बाग हटाने संबंधी हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है।
यह फैसला राज्य के उन किसानों और भूमिहीन परिवारों के लिए राहत लेकर आया है, जिनकी आजीविका पूरी तरह से सेब और अन्य फलों की खेती पर निर्भर है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश के दूरगामी और गंभीर सामाजिक प्रभाव पड़ सकते थे। इस तरह के निर्देश समाज के हाशिये पर खड़े वर्ग, छोटे किसानों और भूमिहीन लोगों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विषय सीधे तौर पर नीति से जुड़ा हुआ है। अदालत ने टिप्पणी की कि न्यायालय को ऐसा कोई आदेश पारित नहीं करना चाहिए, जिससे बड़े पैमाने पर फलदार पेड़ों की कटाई सुनिश्चित हो जाए। खासतौर पर ऐसे राज्य में, जहां कृषि और बागवानी ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वन भूमि पर अतिक्रमण के मामलों में राज्य सरकार कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है। लेकिन यह कार्रवाई मानवीय दृष्टिकोण और कल्याणकारी राज्य की भावना को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह सीमांत किसानों और भूमिहीन लोगों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार को एक ठोस प्रस्ताव भेजे। अदालत ने कहा कि सरकार को ऐसा समाधान तलाशना चाहिए, जिससे पर्यावरण संरक्षण और लोगों की आजीविका-दोनों के बीच संतुलन बना रहे।
यह मामला राज्य सरकार द्वारा दायर उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। इसके साथ ही शिमला के पूर्व उपमहापौर टिकेंद्र सिंह पंवार और अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता राजीव राय की याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष थीं।
इससे पहले 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मानसून के दौरान इस तरह की कार्रवाई से लाखों लोगों की रोजी-रोटी और पर्यावरण दोनों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2 जुलाई को हाईकोर्ट ने वन विभाग को निर्देश दिए थे कि वन भूमि पर लगे सेब के बाग हटाए जाएं और उनकी जगह वन प्रजातियों के पौधे रोपे जाएं। इतना ही नहीं, इस पूरी प्रक्रिया में आने वाले खर्च को अतिक्रमणकारियों से भू-राजस्व की तरह वसूलने का आदेश भी दिया गया था।
याचिका में इस आदेश को मनमाना, अव्यावहारिक और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया गया था। तर्क दिया गया था कि हिमाचल प्रदेश जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील राज्य में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्तर पर बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि मानसून के दौरान सेब के पेड़ों की कटाई से भूस्खलन और मृदा क्षरण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पहाड़ी ढलानों पर लगे सेब के बाग मिट्टी को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
याचिका में यह दलील दी गई कि सेब के बागों को केवल अतिक्रमण के रूप में देखना एकतरफा सोच है। ये बाग हजारों किसानों की आजीविका का आधार है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बिना व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के फलदार पेड़ों को हटाने का आदेश एहतियाती सिद्धांत के खिलाफ है, जो पर्यावरणीय न्याय का मूल आधार माना जाता है। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त आजीविका के अधिकार का भी उल्लंघन है।
याचिका में बताया गया कि 18 जुलाई तक चैथला, कोटगढ़ और रोहड़ू जैसे इलाकों में 3,800 से अधिक सेब के पेड़ काटे जा चुके थे। पूरे प्रदेश में करीब 50,000 पेड़ हटाने की योजना से किसानों में भारी आक्रोश फैल गया था। फल से लदे पेड़ों की कटाई ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ माहौल बना दिया था। इसके अलावा, 2 दिसंबर को वन और अन्य जमीनों से अवैध कब्जे हटाने को लेकर जारी किए गए नोटिसों से भी प्रदेशभर में चिंता और असमंजस का माहौल बन गया था।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को हिमाचल के सेब उत्पादकों ने बड़ी राहत के रूप में देखा है। यह निर्णय न केवल उनकी आजीविका की सुरक्षा करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लिए जाने वाले फैसलों में मानवीय और सामाजिक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।