#धर्म
November 13, 2025
हमारे हिमाचल की ये देवी मां:जिनकी एक ही स्थान पर दो रूपों में होती है पूजा
इन माता रानी ने किया मानवता का उद्धार
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शिमला। देवभूमि हिमाचल के लोग देवी-देवताओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। यहां हर गांव का अपना स्थानीय देवता या देवी होती है। इन देवताओं की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं। लोग अपने देवताओं को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं और उनके आदेशों का पालन करते हैं।
देवता केवल पूजा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि गांव की हर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधि में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। किसी भी शुभ कार्य, त्योहार या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले देवी-देवताओं की राय ली जाती है।
आज के अपने इस लेख में हम आपको हिमाचल की एक ऐसी देवी मां के बारे में बताएंगे- जिनकी एक ही स्थान पर दो रूपों में पूजा होती है। ये देवी मां भगवान विष्णु की इन्द्रियों से जन्मी हैं।
कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी के वरदान से धरती संकट में आई थी, तब इन्हीं माता रानी ने मानवता का उद्धार किया था। इसलिए आज हम हिमाचल में छोटी काशी मंडी की बल्ह घाटी में वासित माँ मुरारी देवी की बात करेंगे।
यह कथा हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की बल्ह घाटी में स्थित माँ मुरारी देवी के मंदिर से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि बहुत प्राचीन समय में मूर नामक एक दैत्य ने घोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे यह वरदान प्राप्त किया कि उसका वध न तो कोई देवता, न कोई मनुष्य, और न ही कोई जानवर करेगा, बल्कि उसे एक कन्या के हाथों से मारा जाएगा।
मूर ने इस वरदान को अमरता समझा और पृथ्वी पर अत्याचार करने लगा। इसके बाद, देवता और मनुष्य भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने मूर से लंबी लड़ाई लड़ी, लेकिन जब विष्णु जी को ब्रह्मा के वरदान की याद आई, तो वे हिमालय के सिकन्दरा धार पर्वत की गुफा में विश्राम करने के लिए गए। मूर ने उन्हें खोजते हुए वहाँ पहुँचकर वार करना शुरू कर दिया।
इस समय विष्णु जी की 16 इन्द्रियाँ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच शरीर कोष और मन—से एक अद्भुत कन्या प्रकट हुई, जिसने मूर के साथ युद्ध करके उसे मार डाला। इस कन्या का नाम 'माँ मुरारी' पड़ा, जो भगवान विष्णु ने स्वयं दिया था। इसी कारण से, इस स्थान को मुरारी धार कहा जाता है, और वहाँ माता के दो रूप—एक शांतकन्या और दूसरा कालरात्रि—के रूप में पिण्डियाँ स्थापित हुईं।
द्वापर युग में, जब पांडव अज्ञातवास में थे, वे इस स्थान पर आए और माता ने उन्हें दर्शन दिए। माता ने कहा, "पहाड़ की चोटी पर खुदाई करो, वहाँ तुम्हें मेरी पिण्डियाँ मिलेंगी।" पांडवों ने माता के आदेशानुसार वहाँ मंदिर का निर्माण किया और पिण्डियों की स्थापना की। आज भी उस स्थान पर पांडवों के पदचिन्ह पत्थरों पर देखे जा सकते हैं।
आज भी मुरारी धार, जो मंडी जिले के एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, हजारों श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। यहाँ हर साल श्रद्धालु माता के दिव्य चमत्कारों का अनुभव करने के लिए पहुँचते हैं।