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February 18, 2026

हिमाचल के इस मंदिर में तोता, कुत्ता और शेर करते थे माता की सेवा- महामाया देती हैं पुत्र प्राप्ति का वर

स्वप्न में दिए माता ने दर्शन

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Mahamaya Temple Sundernagar

मंडी। देवभूमि हिमाचल के सुंदरनगर स्थित प्राचीन महामाया मंदिर से जुड़ी मान्यताएं इसे और भी रहस्यमयी और आस्था का केंद्र बनाती हैं। कहा जाता है कि यहां कभी तोता, कुत्ता और शेर तक माता की सेवा में उपस्थित रहते थे। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना पर महामाया माता संतान सुख का वरदान भी देती हैं। यही कारण है कि दूर-दूर से भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर इस पावन धाम में माथा टेकने पहुंचते हैं।

मंदिर की करते थे रखवाली 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर परिसर में कभी एक तोता, एक शेर और एक कुत्ता माता की सेवा में रहते थे। समय बीतने के साथ उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन आज भी उनकी यादें इस धाम से जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि कुत्ते की समाधि ललित नगर में बनी हुई है, जबकि शेर और तोते को मंदिर के पास ही दफनाया गया था। स्थानीय लोग इसे चमत्कार नहीं, बल्कि माता द्वारा स्वीकार की गई सच्ची सेवा मानते हैं।

 

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स्वप्न में दिए माता ने दर्शन

लोक मान्यताओं के अनुसार विवाह के कई वर्षों बाद भी महाराजा लक्ष्मण सेन को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ था। वंश परंपरा समाप्त होने की चिंता उन्हें सताने लगी। इसी बीच एक रात स्वप्न में महामाया देवी ने उन्हें दर्शन दिए और बताया कि उनके पूर्वज सदियों से देवी के उपासक रहे हैं, लेकिन पूजा-पाठ में नियमों का पालन नहीं हो रहा। देवी ने विधिवत पूजा व्यवस्था पुनः स्थापित करने का निर्देश देते हुए पुत्र रत्न प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

राजा को हुई पुत्र प्राप्ति

स्वप्न से प्रेरित होकर महाराजा ने अपने महल के समीप भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। मान्यता है कि मंदिर निर्माण के कुछ समय बाद ही उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। प्रथम पुत्र महाराज ललित सेन का जन्म चैत्र नवरात्र की पंचमी को हुआ। आगे चलकर महाराजा के पांच पुत्र और दो पुत्रियां हुईं, जिसे देवी कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण माना जाता है।

 

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भव्य वास्तुकला और धार्मिक स्वरूप

मंदिर की वास्तुकला में आधुनिक शैली के साथ मुगलकालीन प्रभाव भी देखने को मिलता है। परिसर में पांच प्रमुख मंदिर स्थापित हैं। मध्य भाग में संगमरमर से बनी महिषासुर मर्दिनी दुर्गा भगवती की भव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। दाईं ओर शिव-गौरा की प्रतिमा और अखंड ज्योति का कक्ष है, जो वर्षों से निरंतर प्रज्ज्वलित है।

मंदिर के एक भाग में महामाया का शयन कक्ष भी बनाया गया है, जहां देवी के विश्राम की परंपरा निभाई जाती है।

 

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इसके अतिरिक्त शेषशायी विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा, भगवान दत्तात्रेय का मंदिर तथा मुख्य द्वार पर केसरी नंदन हनुमान मंदिर स्थापित है। विशेष बात यह है कि परिसर में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब का भी कक्ष है, जहां प्रतिदिन विधिवत रोशनी की जाती है। यह मंदिर सर्वधर्म समभाव की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत करता है।

प्राकृतिक छटा और प्राचीन पहचान

मंदिर परिसर में चंपा और मौलसरी के हरे-भरे वृक्ष वातावरण को सुगंधित और शांत बनाए रखते हैं। इस क्षेत्र का प्राचीन नाम “बनौण” था, क्योंकि यहां बान के वृक्षों का घना वन हुआ करता था। पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहां से सुंदरनगर का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है, जो श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।

 

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चमत्कार और आस्था की कहानी

सुकेत देव समाज के शोधकर्ता आचार्य रोशन लाल के अनुसार लगभग 35 वर्ष पूर्व मंदिर परिसर में दो बार आकाशीय बिजली गिरी, लेकिन मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इसे श्रद्धालु देवी की दिव्य कृपा और अद्भुत शक्ति का प्रतीक मानते हैं।

सुकेत देवता मेला: आस्था का महाकुंभ

चैत्र नवरात्र के दौरान यहां राजस्तरीय सुकेत देवता मेला आयोजित होता है। पंचमी से नवमी तक चलने वाले इस भव्य आयोजन में सुंदरनगर और करसोग क्षेत्र के करीब 150 देवी-देवता भाग लेते हैं। नवमी के दिन सभी देवता महामाया के चरणों में शीश नवाकर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। इसके बाद नगर परिक्रमा कर राजपरिवार को आशीर्वाद दिया जाता है और श्रद्धालुओं को दर्शन का अवसर मिलता है।

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