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February 18, 2026
हिमाचल में शुरू हुआ जुकारू उत्सव - 15 दिनों तक राजा बलि की होगी पूजा, जानें क्या है मान्यता
15 दिनों तक की जाएगी राजा की बलि की पूजा
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चंबा। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में शिवरात्रि के साथ ही जिला चंबा की जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में जुकारू उत्सव शुरू हो गया है। 15 दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक पर्व में राजा बलि की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। पंगवाल समुदाय के लिए यह उत्सव आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है, जिसमें लोक रीति-रिवाजों और धार्मिक अनुष्ठानों का खास महत्व है।
बता दें कि उत्सव की शुरुआत बीते कल मंगलवार आधी रात को धार्मिक विधि-विधान के साथ की गई। लोगों ने अपने घरों की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई कर वातावरण को शुद्ध किया। इसके बाद दीवारों पर बलीराजा का चित्र बनाकर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की गई।
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परंपरा के अनुसार घर का मुखिया शाम के समय आटे से बकरे और भरेस भंगड़ी तैयार करता है और इस दौरान पूरा मौन रखा जाता है। पूजा का सामान अलग कमरे में रखा जाता है ताकि पवित्रता बनी रहे।
आज बुधवार सुबह ब्रह्म मुहूर्त में गंगाजल छिड़ककर और विशेष मंत्रोच्चार के साथ बलीराजा की विधिवत स्थापना की गई। अब पूरे 15 दिन तक घरों में राजा बलि की ही पूजा की जाएगी। घरों में खास चौका या मंडप बनाया जाता है।
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जिसे गोमूत्र और गंगाजल से शुद्ध कर गेहूं के आटे और जौ के सत्तुओं से सजाया जाता है। स्थानीय बोली में बलीराजा को “जन बलदानों राजा” कहा जाता है। श्रद्धालु आटे से बने बकरे और मेढ़े अर्पित कर पूजा करते हैं।
जुकारू सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण लोग लंबे समय तक घरों में सीमित रहते हैं। ऐसे में यह त्योहार एक-दूसरे से मिलने-जुलने और रिश्ते मजबूत करने का मौका देता है।
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लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। इस परंपरा को “पड़ीद” कहा जाता है। अभिवादन के समय “तकड़ा थिया न” और विदाई के समय “मठे मठे विश” कहकर सम्मान जताया जाता है।
उत्सव के तीसरे या पांचवें दिन भूमि पूजन किया जाता है, जिसे मांगल या पन्हेई कहा जाता है। इस दिन हर घर से सत्तू, घी, शहद, बीज और आटे के बकरे लाकर सामूहिक पूजा की जाती है। इसके बाद कृषि कार्यों की शुरुआत होती है। इस तरह जुकारू पर्व प्रकृति और जीवन चक्र से भी जुड़ा हुआ है।
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उत्सव के दौरान उवान या ईवान मेला भी लगता है, जो कई दिनों तक चलता है। इसमें स्वांग नृत्य खास आकर्षण होता है। लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनकर धार्मिक और लोक कथाओं का मंचन करते हैं। ढोल-नगाड़ों की धुन पर पूरा इलाका गूंज उठता है। यह आयोजन पंगवाल संस्कृति और लोक विरासत को सहेजने का बड़ा माध्यम है।
पंगवाल एकता मंच के अध्यक्ष त्रिलोक ठाकुर ने सभी पांगी वासियों को जुकारू उत्सव की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्व को राज्य स्तरीय मान्यता दी जाए, ताकि इसे और व्यापक पहचान मिल सके।