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February 24, 2026

हिमाचल के इस मंदिर में फूट-फूटकर रोने लगीं थीं इंदिरा गांधी- बेटे संजय गांधी की मौ*त से जुड़ी है कहानी

एक दिन वह रोती हुई यहां आएंगी बोले पुजारी 

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Chamunda Devi History

कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में एक ऐसा मंदिर है जिसके तार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की मौत से जुड़े हैं। ऐसा कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ये पूछने को मजबूर हो गईं थीं कि क्या इस मंदिर में ना जाने से उनके बेटे की मौत हुई। दरअसल इंदिरा गांधी इस मंदिर जानें वाली होती हैं लेकिन किसी कारण उनका जाना रद्द हो जाता है और हैरानी की बात ये होती है कि अगले ही दिन संजय गांधी की प्लेन क्रैश में मौत हो जाती है।

31 अक्टूबर 1984, जब देश ने खो दी अपनी प्रधानमंत्री

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। कहा जाता है कि उन्हें पहले से खतरे की चेतावनी दी गई थी, लेकिन उन्होंने अपनी सुरक्षा में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया।

 

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उनके करीबी लोग बताते हैं कि जीवन के आखिरी वर्षों में वह काफी आध्यात्मिक हो गई थीं। मंदिरों में जाना, पूजा-पाठ करना और साधु-संतों से मिलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।

1980 में दोबारा सत्ता में वापसी और चामुंडा मंदिर का कार्यक्रम

1977 में इमरजेंसी के बाद सत्ता से बाहर होने के तीन साल बाद 1980 में इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बनीं। सत्ता में वापसी के बाद उन्होंने कई धार्मिक स्थलों पर जाने का कार्यक्रम बनाया। इसी दौरान 22 जून 1980 को बेटे संजय गांधी के साथ हिमाचल प्रदेश के चामुंडा देवी मंदिर जाने का कार्यक्रम तय हुआ।

 

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मंदिर प्रशासन और स्थानीय लोग इस दौरे को लेकर काफी उत्साहित थे।  तैयारियां भी शुरू हो चुकी थीं। लेकिन ऐन मौके पर किसी कारणवश उनका दौरा रद्द हो गया। प्रधानमंत्री का कार्यक्रम रद्द होने की खबर मिलते ही मंदिर के पुजारी नाराज हो गए।

एक दिन वह रोती हुई यहां आएंगी बोले पुजारी 

बताया जाता है कि उन्होंने इंदिरा गांधी के करीबी अनिल बाली से कहा, मां चामुंडा शासकों का अपमान सहन नहीं करतीं। आम आदमी से भूल हो जाए तो क्षमा है, लेकिन राजा से नहीं। एक दिन वह रोती हुई यहां आएंगी।

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अगले ही दिन आई दुखद खबर

22 जून को दौरा रद्द हुआ और 23 जून 1980 को खबर आई कि संजय गांधी की दिल्ली में विमान दुर्घटना में मौत हो गई। यह खबर इंदिरा गांधी के लिए बहुत बड़ा सदमा थी। संजय गांधी उनके सबसे करीबी और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे।

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कहा जाता है कि जब अनिल बाली उनसे मिलने पहुंचे तो इंदिरा गांधी ने घबराए स्वर में पूछा –
“क्या मेरे चामुंडा मंदिर न जाने से संजय की मौत का कोई संबंध है। हालांकि इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था, लेकिन यह बात उनके मन में कहीं बैठ गई थी।

मंदिर पहुंचीं और फूट-फूट कर रोईं

करीब छह महीने बाद, 13 दिसंबर 1980 को इंदिरा गांधी चामुंडा मंदिर पहुंचीं। पुजारी के अनुसार, जब वे पूजा कर रही थीं तो उनके हाथ कांप रहे थे। गर्भगृह में माता के सामने सिर झुकाकर बैठीं और जोर-जोर से रोने लगीं। वहां मौजूद लोगों ने पहली बार देश की प्रधानमंत्री को इस तरह टूटते हुए देखा। बताया जाता है कि उसके बाद उन्होंने हर महीने 101 रुपये का लिफाफा मंदिर भिजवाना शुरू किया। यह सिलसिला उनकी मृत्यु तक चलता रहा।

पौराणिक कथा क्या कहती है?

प्रदेश के पालमपुर में स्थित चामुंडा देवी मंदिर करीब 700 साल पुराना माना जाता है। इसे माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यह स्थान भगवान शिव और माता शक्ति का पवित्र निवास स्थल है, जहां वे अपने दिव्य भ्रमण के दौरान विश्राम करते हैं। पुराणों के अनुसार, मां चामुंडा ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध किया था। इस युद्ध के बाद माता का क्रोध बहुत प्रचंड हो गया।

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उनके उग्र रूप से पूरा क्षेत्र भयभीत था। कहते हैं कि माता के क्रोध को शांत करने के लिए स्थानीय लोग बलि देने लगे। एक दिन एक महिला के बेटे की बारी आई। वह पुत्र उसे भगवान शिव की कृपा से मिला था। मां होने के नाते उसने बेटे को बलि के लिए भेज तो दिया, लेकिन मन ही मन भगवान शिव से उसकी रक्षा की प्रार्थना भी करती रही।

बालक का किया रूप धारण 

भगवान शिव ने बाल रूप धारण किया और बलि के लिए जा रहे उस बच्चे के साथ रास्ते में खेलने लगे। उधर जब बलि में देर हुई तो मां चामुंडा और अधिक क्रोधित हो गईं। जब उन्होंने देखा कि बच्चा खेल रहा है, तो कारण पूछा। बच्चे ने बताया कि वह तो आ रहा था, लेकिन इस बालक ने उसे रोक लिया।

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पांच पत्थरों की कथा

माता का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने उस बालक (जो वास्तव में भगवान शिव थे) का पीछा किया और उन पर पांच विशाल पत्थर फेंके। मान्यता है कि मंदिर परिसर में आज भी वे पत्थर मौजूद हैं। कथा के अनुसार, शिव ने उन पत्थरों में से एक को अपनी उंगली पर उठा लिया।

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तभी मां चामुंडा को आभास हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं। उनका क्रोध तुरंत शांत हो गया। उन्होंने शिव से क्षमा मांगी और आग्रह किया कि वे भी इसी स्थान पर विराजमान हों। तभी से यह स्थान शिव-शक्ति के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

रोज आता है एक शव अनोखी परंपरा

चामुंडा मंदिर की एक विशेष परंपरा भी है। मान्यता है कि यहां रोजाना एक शव का अंतिम संस्कार होना चाहिए। कहा जाता है कि यदि किसी दिन कोई शव नहीं आता, तो घास का पुतला बनाकर उसका दाह संस्कार किया जाता है। मंदिर परिसर में स्थित मुक्तिधाम में दूर-दूर से लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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