#धर्म
March 17, 2025
हिमाचल के वो देवता साहिब- जिनके जल के बिना नहीं होता शांत और भूंडा महायज्ञ
ठाकुरों के परिवार ने देवता का किया था अपमान, हुआ नाश
शेयर करें:
शिमला। देवभूमि हिमाचल में प्रकृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां की हर घाटी, हर पर्वत और हर नदी को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। मान्यता है कि हिमालय की गोद में स्थित यह प्रदेश देवताओं की कृपा से समृद्ध और पवित्र बना हुआ है।
यहां के लोग देवी-देवताओं को केवल पूजनीय नहीं, बल्कि अपना संरक्षक मानते हैं। प्रत्येक गांव और कस्बे में एक स्थानीय देवता होता है, जिन्हें लोग अपने परिवार के सदस्य की तरह मान-सम्मान देते हैं। ये देवता न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा हैं।
आज के अपने इस लेख में हम आपको हिमाचल के एक ऐसे देवता साहिब के बारे में बताएंगे- जिनका कोई देवदोष नहीं होता। यह देवता साहिब सीधा श्राप देते हैं।
ठाकुरों के परिवार ने इस देवता साहिब का अपमान किया था- जिनका फिर समूल नाश हो गया था। आज भी इन देवता साहिब के आधिपत्य में एक भी ठाकुर निवास नहीं करते हैं।
हम बात कर रहे हैं रोहडू के रंटाडी में विराजित- महर्षि उतंग के स्वरुप देवता साहब मोहरिश जी महाराज की- जिनके उत्पत्ति स्थल से निकले जल के बिना शांत और भूंडा जैसा कोई भी महायज्ञ पूरा नहीं होता है।
कथा अनुसार- महर्षि उतंग महाभारत का युद्ध रुकवाना चाहते थे और भगवान श्री कृष्ण को भी श्राप देने वाले थे। मगर भगवान ने महर्षि उतंग को अपना असली रूप दिखाकर शांत करवाया। जिसके बाद महर्षि उतंग उत्तर दिशा की ओर बढ़े और रोहडू के उतगा देवरा नामक स्थान पर आकर तपस्या में लीन हो गए- जिसका शिला रूपी प्रमाण आज भी मौजूद है।
देवता साहब मोहरिश जी महाराज स्वयं अपने देवबखान में बताते हैं कि- रोहडू के कशटाणी गांव में पहले ठाकुर परिवार रहते थे। जहां रहने वाली एक महिला ने देवता जी के चमत्कार को सबसे पहले महसूस किया और पवित्र बावड़ी से प्राप्त हुई उनकी मूर्ती को अपने साथ गांव में ले आई।
मगर देवता जी के तमाम चमत्कार देखने के बाद भी इन ठाकुर परिवारों ने उनका सम्मान नहीं किया और उनकी मूर्ती को कभी तबेले में रखा- तो कभी मुर्गों के बाड़े में।
इस दौरान उन्होंने हथौड़े से देवता जी की मूर्ती को तोड़ना भी चाहा- जिससे मूर्ती को तो कुछ नहीं हुआ- लेकिन उन ठाकुर परिवारों का समूल नाश हो गया। बताते हैं कि इसके बाद बरटू गांव के लोगों ने देवता जी इस मूर्ति को उनके मंदिर में स्थापित कर दिया था।