#राजनीति
August 1, 2026
हिमाचल में सियासी भूचाल: विजिलेंस रडार पर एक और पूर्व MLA, इसने भी कांग्रेस छोड़ थामा था BJP का दामन
राजगढ़ सड़क निर्माण केस में पूर्व विधायक पर एफआईआर दर्ज करने की तैयारी में विजिलेंस
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त गर्माहट देखने को मिल रही है। राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (विजिलेंस) की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों से राजनीतिक गलियारों में खलबली मची हुई है। एक के बाद एक विधायकों और पूर्व विधायकों पर विजिलेंस का शिकंजा कसता जा रहा है।
हाल ही में देहरा के पूर्व विधायक होशियार सिंह और फिर धर्मशाला के विधायक सुधीर शर्मा के खिलाफ जांच के बाद, अब एक और पूर्व विधायक एजेंसी के रडार पर आ गए हैं। सिरमौर जिले के चर्चित राजगढ़ सड़क निर्माण मामले में विजिलेंस को ऐसे ठोस साक्ष्य मिले हैं, जिसके आधार पर उक्त नेता को एफआईआर में नामजद करने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
सियासी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि जिन तीन मौजूदा और पूर्व विधायकों पर विजिलेंस की गाज गिर रही है, उनमें से दो नेता सुधीर शर्मा और एक अन्य पूर्व विधायक कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। वहीं तीसरे होशियार सिंह ने भी पहले सत्ताधारी पार्टी का समर्थन किया था और बाद में अपना राजनीतिक रुख बदल लिया था। इसके चलते प्रदेश का राजनीतिक पारा चढ़ गया है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
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राजगढ़ सड़क निर्माण केस की जांच अब पूरी तरह से राजनीतिक मोड़ ले चुकी है। विजिलेंस सूत्रों के मुताबिक, पूर्व विधायक पर अपने व्यावसायिक साझेदार के साथ मिलकर सैकड़ों बीघा जमीन खरीदने और फिर अपने निजी आर्थिक लाभ के लिए सरकारी खजाने के पैसों से वहां तक पक्की सड़क बनवाने का गंभीर आरोप है। जांच एजेंसी इस बात की परतें उधेड़ रही है कि आखिर किसके राजनीतिक दबाव में सड़क का निर्माण स्वीकृत सीमा को लांघकर संरक्षित वन क्षेत्र और शामलात (साझा) भूमि तक पहुंचा दिया गया। इस पूरे खेल में किसे-किसने सीधा फायदा पहुंचाया, इसका पूरा हिसाब-किताब जुटाया जा रहा है।
इस कथित अवैध सड़क निर्माण, वन भूमि पर अतिक्रमण और बेधड़क काटे गए हरे पेड़ों के मामले में विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी कटघरे में है। इसी सिलसिले में विजिलेंस मुख्यालय शिमला ने संबंधित वन मंडलाधिकारी (डीएफओ), वन रक्षकों और अन्य अफसरों को तलब कर घंटों तक पूछताछ की है।
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एजेंसी यह पता लगा रही है कि इस पूरे मामले में सिर्फ विभागीय लापरवाही थी या फिर राजनीतिक दबाव के चलते जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं। फिलहाल, एसवी एंड एसीबी थाना (नाहन) में भारतीय न्याय संहिता और भारतीय वन अधिनियम की धाराओं के तहत मामला प्रक्रियाधीन है और डिजिटल व वित्तीय रिकॉर्ड्स की फोरेंसिक जांच जारी है।
विजिलेंस इस मामले को केवल एक अवैध सड़क निर्माण तक सीमित नहीं मान रही है, बल्कि इसे सरकारी धन की हेराफेरी, पर्यावरणीय क्षति और वित्तीय अनियमितताओं की एक सोची-समझी साजिश के रूप में देख रही है।
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विशेष जांच दल (SIT) सड़क निर्माण के लिए आवंटित बजट, ठेकेदारों को हुए भुगतान और बैंक खातों के बीच लेनदेन यानी 'मनी ट्रेल' की गहनता से पड़ताल कर रहा है। अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि जांच पूरी तरह से मिले सबूतों पर आधारित है, चाहे कितना भी प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो, दोषी पाए जाने पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
एक के बाद एक दल बदलने वाले नेताओं के खिलाफ विजिलेंस के सख्त एक्शन से प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां बेहद तेज हो गई हैं। विपक्ष का रुख: राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि चुनाव से पहले या दल बदलने के बाद अचानक शुरू हुई ये जांचें किस हद तक निष्पक्ष हैं। भाजपा खेमे में इसे लेकर हलचल बढ़ गई है और इसे राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।
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वहीं दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति के तहत स्वतंत्र एजेंसियां निष्पक्षता से अपना काम कर रही हैं और कानून अपना रास्ता तय कर रहा है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि विजिलेंस द्वारा तैयार की जा रही इस नई एफआईआर के बाद हिमाचल की राजनीति में क्या नया मोड़ आता है!