#राजनीति
October 14, 2026
सुक्खू सरकार का मास्टर स्ट्रोक : विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में बनेंगे नए जिले! आयोग गठित
आयोग करेगा प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार ने नए जिलों के गठन और मौजूदा प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव की संभावनाओं का आकलन करने के लिए राज्य सरकार ने आयोग गठित किया है। हिमाचल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति धर्मचंद चौधरी को आयोग की कमान सौंपी गई है। सरकार की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। आयोग को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंपनी होंगी।
प्रदेश में लंबे समय से अलग-अलग क्षेत्रों को जिला बनाने की मांग उठती रही है। अब सरकार ने इन मांगों और प्रशासनिक जरूरतों का अध्ययन करने के लिए औपचारिक प्रक्रिया शुरू की है। हालांकि, आयोग के गठन का अर्थ यह नहीं है कि नए जिले बनाने का अंतिम फैसला हो चुका है। इस संबंध में निर्णय आयोग की रिपोर्ट, उसकी सिफारिशों और सरकार के विचार-विमर्श के बाद ही सामने आएगा।
नए जिलों की संभावनाओं पर विचार करने के लिए गठित आयोग में कुल चार सदस्य होंगे। इसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति धर्मचंद चौधरी करेंगे। एडवोकेट विशाल पंवार और सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी राजेश शर्मा को भी आयोग में शामिल किया गया है। भूमि अभिलेख निदेशक आयोग के सदस्य सचिव की जिम्मेदारी निभाएंगे। आयोग का मुख्यालय शिमला में निर्धारित किया गया है। इसे प्रदेश की मौजूदा प्रशासनिक इकाइयों का विस्तृत अध्ययन करना होगा। इसके बाद उपलब्ध तथ्यों और विभिन्न पक्षों से प्राप्त सुझावों के आधार पर सरकार के सामने अपनी सिफारिशें रखनी होंगी।
आयोग के सामने केवल नए जिले बनाने की संभावनाओं का अध्ययन करने की जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि मौजूदा प्रशासनिक ढांचे में जरूरी बदलावों पर भी विचार करना होगा। इसमें जिलों की सीमाओं में संशोधन, किसी प्रशासनिक इकाई का विभाजन या दो इकाइयों के विलय जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं। अध्ययन के दौरान जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियों, प्रशासनिक जरूरतों और लोगों को मिलने वाली सुविधाओं को ध्यान में रखा जाएगा।
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में कई क्षेत्र दूर-दराज की घाटियों और दुर्गम इलाकों में बसे हैं। ऐसे में जिला मुख्यालय तक पहुंचने में लगने वाला समय और सरकारी सेवाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण पहलू होंगे। आयोग को यह देखना होगा कि प्रशासनिक पुनर्गठन से आम लोगों को वास्तविक लाभ कितना मिलेगा और किन क्षेत्रों में मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत महसूस की जाती है।
हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की मांग समय-समय पर अलग-अलग क्षेत्रों से उठती रही है। कांगड़ा जिले के नूरपुर, देहरा और पालमपुर को जिला बनाने की चर्चाएं होती रही हैं। इसी तरह सोलन जिले के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी और शिमला जिले के रामपुर को लेकर भी ऐसी मांगें सामने आती रही हैं। फिलहाल इन क्षेत्रों में से किसी को नया जिला घोषित नहीं किया गया है।
आयोग विभिन्न क्षेत्रों की परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों का अध्ययन करने के बाद ही इस बारे में अपनी सिफारिशें दे सकेगा। प्रदेश में अभी 12 जिले हैं—शिमला, कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन, ऊना, सिरमौर, कुल्लू, किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा और मंडी। नए जिले बनाने की संभावनाओं पर विचार के दौरान इन्हीं मौजूदा जिलों की सीमाओं और प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी।
आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों से चर्चा करने का अधिकार दिया गया है। इसमें जलशक्ति विभाग, लोक निर्माण विभाग, वन विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग सहित अन्य संबंधित विभागों के सचिवों को विचार-विमर्श के लिए बुलाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में राजस्व विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।
क्योंकि जिलों और प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं से जुड़े मामलों में राजस्व रिकॉर्ड और भौगोलिक सीमाओं का विशेष महत्व होता है। आयोग आम जनता, सामाजिक समूहों, विभिन्न हितधारकों और जनप्रतिनिधियों से भी सुझाव ले सकेगा। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की मांगों, समस्याओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं को समझने में मदद मिलेगी। इन सुझावों और विभागीय जानकारी के आधार पर आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा।
प्रशासनिक पुनर्गठन के साथ आर्थिक पहलू भी आयोग के अध्ययन का अहम हिस्सा होगा। नए जिले बनने पर जिला मुख्यालय, कार्यालयों, कर्मचारियों, बुनियादी ढांचे और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर खर्च की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए आयोग को प्रस्तावित बदलावों से राज्य सरकार पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय भार का आकलन भी करना होगा।
हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन पर विचार करते समय यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि लोगों को बेहतर प्रशासनिक सुविधाएं देने के लिए कितना अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और राज्य की आर्थिक स्थिति में इसे किस तरह समायोजित किया जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र को जिला बनाने से सरकारी सेवाओं तक लोगों की पहुंच आसान होती है, तो उसके संभावित लाभ और स्थापना व संचालन की लागत दोनों का तुलनात्मक आकलन जरूरी होगा। आयोग की सिफारिशों में यह पहलू अहम भूमिका निभा सकता है।
हिमाचल में कुछ क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था को बेहतर तरीके से संभालने के लिए पुलिस जिला व्यवस्था भी बनाई गई है। नूरपुर, बद्दी और देहरा जैसे क्षेत्रों में पुलिस प्रशासन की अलग व्यवस्था होने से यह स्पष्ट होता है कि पुलिस जिला और पूर्ण प्रशासनिक जिला अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं।
इसी तरह राजनीतिक दल भी अपनी संगठनात्मक जरूरतों के अनुसार संगठनात्मक जिलों और ब्लॉकों का गठन करते हैं। भाजपा और कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना प्रशासनिक जिलों से अलग हो सकती है। इसलिए किसी क्षेत्र का पुलिस जिला या राजनीतिक संगठनात्मक जिला होना अपने आप में उसे पूर्ण प्रशासनिक जिला बनाने के बराबर नहीं है।
हिमाचल प्रदेश में नए जिलों को लेकर मांगें पहले भी उठती रही हैं, लेकिन अब सरकार ने इन पर विचार करने के लिए आयोग गठित कर औपचारिक प्रक्रिया शुरू की है। अगले छह महीने में आयोग को विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों, प्रशासनिक व्यवस्था, जनता की सुविधाओं और संभावित खर्च का आकलन करना होगा।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रदेश में कितने नए जिले बनेंगे या किन क्षेत्रों को जिला बनाने की सिफारिश की जाएगी। अंतिम तस्वीर आयोग की रिपोर्ट और उस पर सरकार के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी