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October 14, 2026
हिमाचल : पंचायतों को मिली पेयजल बचाने की बड़ी जिम्मेदारी, हर गांव का बनेगा जल बजट
अब पंचायत स्तर पर तैयार होगा जल बजट
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में आने वाले समय में पेयजल संकट से निपटने और गांवों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए पंचायत स्तर पर नई व्यवस्था लागू की जा रही है। अब ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र के पेयजल स्रोतों की स्थिति पर नजर रखेंगी। जलस्रोतों के संरक्षण, पानी की गुणवत्ता की निगरानी और भविष्य में पानी की जरूरतों का आकलन करने में पंचायतों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण होगी।
सरकार ने यह जिम्मेदारी पंचायतों में पहले से गठित जल एवं स्वच्छता समितियों को सौंपी है। ये समितियां अब ग्राम पंचायत स्रोत संरक्षण समिति के रूप में भी कार्य करेंगी। इसका उद्देश्य गांवों के जलस्रोतों को सुरक्षित रखना, पानी की बर्बादी और कमी से जुड़े खतरों की समय रहते पहचान करना तथा जल संरक्षण के कार्यों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाना है।
पंचायती राज विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के तहत समितियों को अपने पंचायत क्षेत्र में मौजूद पेयजल स्रोतों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करना होगा। इसमें जलस्रोतों से संबंधित बुनियादी जानकारी दर्ज करने के साथ जरूरी रजिस्टर भी बनाए रखने होंगे। इस व्यवस्था से पंचायत स्तर पर यह जानकारी उपलब्ध हो सकेगी कि गांव में पेयजल के कौन-कौन से स्रोत हैं और उनकी स्थिति कैसी है।
जलस्रोतों की निगरानी से जुड़ी आवश्यक सूचनाएं डिजिटल व्यवस्था के लिए संबंधित विभागों को भी उपलब्ध करवानी होंगी। समितियों को केवल रिकॉर्ड तैयार करने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि जलस्रोतों की सुरक्षा और रखरखाव पर भी ध्यान देना होगा। इससे स्थानीय स्तर पर जलस्रोतों की स्थिति का आकलन करने और जरूरत के अनुसार संरक्षण के कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी समितियों की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा होगा। पानी की जांच के दौरान प्रयोगशालाओं और फील्ड टेस्टिंग किट के इस्तेमाल में सहयोग किया जाएगा। यदि किसी स्रोत के पानी की गुणवत्ता में गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी तुरंत देनी होगी। इसके अलावा, पानी के स्रोतों के सूखने, उनमें गाद जमा होने या जलापूर्ति प्रभावित होने जैसी समस्याओं पर भी नजर रखी जाएगी।
ऐसे संभावित खतरों की पहचान होने पर मामला संबंधित विभाग तक पहुंचाना होगा, ताकि समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सके। हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता कई प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है। ऐसे में इन स्रोतों की स्थिति में बदलाव का समय पर पता लगना महत्वपूर्ण है। नई व्यवस्था के तहत पंचायत स्तर पर निगरानी बढ़ने से स्थानीय समस्याओं की जानकारी विभागों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
नई व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ग्राम पंचायत का जल बजट तैयार करना है। इसके माध्यम से पंचायत क्षेत्र में पानी की उपलब्धता और उसकी जरूरतों का आकलन किया जा सकेगा। समिति ग्राम पंचायत विकास योजना यानी जीपीडीपी तैयार करने में भी सहयोग करेगी। जल बजट के जरिए यह समझने में मदद मिलेगी कि उपलब्ध जल संसाधनों के मुकाबले गांवों में पानी की मांग कितनी है और संरक्षण के किन कार्यों को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
इसके आधार पर पंचायतें जलस्रोतों को सुरक्षित रखने और पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए योजनाएं तैयार करने में सहयोग कर सकेंगी। इस प्रक्रिया में छोटे स्तर पर जल पुनर्भरण और संरक्षण से जुड़े कार्यों के रखरखाव को भी शामिल किया गया है। यानी पानी की समस्या सामने आने के बाद कदम उठाने के बजाय भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर योजना बनाने पर जोर रहेगा।
समितियां जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी उपायों की योजना बनाने तथा उनके क्रियान्वयन की निगरानी में भी भाग लेंगी। जल पुनर्भरण से जुड़े कार्यों के माध्यम से वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने और स्थानीय जल संसाधनों को बेहतर बनाए रखने के प्रयास किए जा सकेंगे। इन कार्यों को अलग-अलग सरकारी योजनाओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने का प्रावधान है।
इसके लिए वीबी-जी रामजी, वाटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट-प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 और अन्य संबंधित योजनाओं के साथ समन्वय किया जा सकेगा। योजनाओं के बीच तालमेल से पंचायत स्तर पर जल संरक्षण के कार्यों को व्यवस्थित रूप देने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इन प्रयासों का वास्तविक लाभ स्थानीय स्तर पर निगरानी, समय पर कार्रवाई और संरक्षण कार्यों के रखरखाव पर निर्भर करेगा।
पंचायती राज विभाग ने यह व्यवस्था जलशक्ति विभाग के अनुरोध और जल जीवन मिशन 2.0 के दिशा-निर्देशों के अनुरूप लागू की है। इसके तहत पहले से मौजूद जल एवं स्वच्छता समितियों की भूमिका का विस्तार किया गया है, ताकि पेयजल स्रोतों की सुरक्षा और दीर्घकालीन स्थिरता के लिए पंचायत स्तर पर जिम्मेदारी तय हो सके। नई व्यवस्था में पंचायतों को जलस्रोतों का रिकॉर्ड रखने, गुणवत्ता संबंधी समस्याओं की सूचना देने, जल बजट तैयार करने और संरक्षण कार्यों की निगरानी में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।