#राजनीति
July 19, 2026
कभी वीरभद्र खेमे के विरोधी रहे कौल सिंह ने क्यों लिया राजनीति से सन्यास, अधूरी रह गई CM बनने की हसरत
कौल सिंह के हाथों से दो बार फिसली सीएम की कुर्सी अब चुना आध्यात्मिक मार्ग
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मंडी। हिमाचल प्रदेश की राजनीति से रविवार को एक ऐसी खबर सामने आई जिसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज कर दिया। प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले ठाकुर कौल सिंह ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया है। आठ बार विधायक, चार बार मंत्री, दो बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके कौल सिंह के इस फैसले को हिमाचल की राजनीति में एक बड़े अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है।
करीब पांच दशक तक प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कौल सिंह ठाकुर ने अब सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाकर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का निर्णय लिया है। उनके इस ऐलान के बाद कांग्रेस संगठन से लेकर प्रदेश की सियासत तक में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
ठाकुर कौल सिंह का राजनीतिक सफरनामा किसी ऐतिहासिक गाथा से कम नहीं है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत आपातकाल के ठीक बाद वर्ष 1977 में दिवंगत नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की पार्टी 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' से जुड़कर की थी। उन्होंने अपना पहला चुनाव जनता पार्टी के सिंबल पर लड़ा और द्रंग विधानसभा क्षेत्र से जीतकर पहली बार शिमला विधानसभा की दहलीज लांघी। इसके बाद वे कांग्रेस का अभिन्न हिस्सा बन गए और ताउम्र इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़े।
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कौल सिंह ठाकुर ने द्रंग सीट पर अपनी ऐसी मजबूत जमीनी पकड़ बनाई कि उन्होंने 1982, 1985, 1993, 1998, 2003, 2007 और 2012 में रिकॉर्ड आठ बार जीत दर्ज की। अपने इस लंबे कार्यकाल में वे 1993 से 1998 तक हिमाचल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) रहे और अलग-अलग सरकारों में स्वास्थ्य, राजस्व, कानून व सिंचाई जैसे रसूखदार विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे।

हिमाचल कांग्रेस की राजनीति में कौल सिंह ठाकुर और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बीच राजनीतिक मतभेद किसी से छिपे नहीं थे। एक समय ऐसा भी था जब कौल सिंह को वीरभद्र विरोधी खेमे का प्रमुख चेहरा माना जाता था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने संगठन में मजबूत पकड़ बनाई थी और कई मौकों पर उनकी राजनीतिक रणनीति चर्चा का विषय बनी। हालांकि वीरभद्र सिंह के मजबूत राजनीतिक कद और केंद्रीय नेतृत्व में प्रभाव के चलते सत्ता का अंतिम फैसला हमेशा उनके पक्ष में जाता रहा।
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ठाकुर कौल सिंह कई बार सूबे के मुख्यमंत्री पद (CM Post) की रेस में सबसे आगे रहे, लेकिन हर बार अंतिम समय में राजा वीरभद्र सिंह की राजनीतिक चतुराई के आगे उनकी यह हसरत अधूरी रह गई। साल 2012 में कौल सिंह ठाकुर हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे और उन्हें वीरभद्र विरोधी खेमे का सबसे मुख्य चेहरा माना जाता था।
उस समय उनके सीएम बनने के शत-प्रतिशत चांस थे। तत्कालीन हिमाचल कांग्रेस प्रभारी चौधरी बीरेंद्र सिंह भी कौल सिंह के बेहद करीबी थे। लेकिन वीरभद्र सिंह ने दिल्ली हाईकमान के सामने ऐसी गोटियां फिट कीं कि चुनाव से ठीक पहले कौल सिंह से अध्यक्ष पद छीन लिया। नतीजा यह हुआ कि चुनाव जीतने के बाद भी कौल सिंह को केवल कैबिनेट मंत्री के पद से ही संतोष करना पड़ा।
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2022 के विधानसभा चुनाव में भी उनके मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं थीं, लेकिन द्रंग विधानसभा क्षेत्र से महज 618 वोटों के बेहद मामूली अंतर से मिली हार ने उनके सारे राजनीतिक अरमानों पर पानी फेर दिया। इससे पहले 2017 में भी उन्हें शिकस्त झेलनी पड़ी थी।
2012 में आठवीं बार विधायक बनने के बाद कौल सिंह ठाकुर का राजनीतिक ग्राफ धीरे-धीरे बदलता गया। वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्हें लगातार हार का सामना करना पड़ा। इन हारों ने उनके सक्रिय राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए थे। इसके बावजूद वह कांग्रेस की राजनीति में वरिष्ठ नेता के रूप में अपनी मौजूदगी बनाए हुए थे। हालांकि बदलते राजनीतिक परिदृश्य और नई पीढ़ी के नेतृत्व के उभरने के साथ उनकी भूमिका सीमित होती चली गई।

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प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी कौल सिंह ठाकुर को कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक या प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं मिली। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लगातार रही कि पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में शामिल होने के बावजूद उन्हें अपेक्षित भूमिका नहीं दी गई। कई अवसरों पर उन्होंने अपनी उपेक्षा को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से असंतोष भी जाहिर किया था। माना जाता है कि यह स्थिति भी उनके सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के फैसले की एक वजह रही।
अपने संन्यास के फैसले के साथ कौल सिंह ठाकुर ने संकेत दिया है कि अब राजनीति में नई पीढ़ी को आगे आने का अवसर मिलना चाहिए। लंबे राजनीतिक अनुभव के बाद उन्होंने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में नेतृत्व परिवर्तन और युवाओं की भागीदारी समय की आवश्यकता है।
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राजनीतिक जीवन को अलविदा कहने के बाद कौल सिंह ठाकुर अब आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। हरियाणा स्थित संत रामपाल के आश्रम पहुंचकर उन्होंने सार्वजनिक रूप से राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की। इस दौरान वह अपनी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मौजूद रहे। उन्होंने संत रामपाल का आशीर्वाद लिया, हिमाचली टोपी और प्रदेश के ऑर्गेनिक फल भेंट किए तथा भविष्य में आध्यात्मिक साधना और सामाजिक सेवा के मार्ग पर चलने की इच्छा जताई। संत रामपाल ने भी उन्हें भक्ति और आध्यात्मिक जीवन अपनाने की सलाह दी।