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August 14, 2025
हिमाचल की ये इमारत है आजादी की गवाह, यहीं पड़ी विभाजन की नींव - अब है किताबों का खजाना
पहले राष्ट्रपति निवास थी ये बिल्डिंग
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला ऐतिहासिक शहर है। यहां की इमारतें आजादी की दास्तान भी बयां करती हैं। इन्हीं में से एक इमारत है वर्तमान की भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान। ये इमारत स्वतंत्रता से जुड़ी हर हलचल की गवाह है। आइए जानते हैं इस खास इमारत के बारे में।
ब्रिटिश काल में शिमला शहर में ब्रिटिश हुकूमत के वॉयसराय रहा करते थे। जिस इमारत में वो रहते थे, उसे पहले वॉइसरीगल लॉज कहा गया। आजादी के बाद इस इमारत को राष्ट्रपति का निवास बनाया गया। आखिर में राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस इमारत को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में तब्दील कर दिया। वर्तमान में भी इस इमारत का यही नाम है और इसे इसी से जुड़े कार्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
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ब्रिटिश शासकों की पहाड़ी स्टेशन की तलाश शिमला में पूरी हुई। तब के ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड डफरीन ने शिमला को भारत की समर कैपिटल बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए एक आलीशान इमारत बनाने का फैसला लिया गया। साल 1884 में इसका निर्माण शुरू हुआ जो साल 1888 में खत्म हुआ। इसे बनाने में कुल 38 लाख की लागत आई। ये इमारत स्कॉटिश बेरोनियन शैली की है जबकि फर्नीचर विक्टोरियन शैली का है। इमारत में कुल 120 कमरे हैं।
साल 1945 की शिमला कॉनफ्रेंस इसी इमारत में हुई थी। फिर साल 1946 में कैबिनेट मिशन की मीटिंग हुई। इसमें देश के आजादी के ड्राफ्ट पर चर्चा हुई। अंग्रेजों ने भारत को उनकी गुलामी से आजादी प्रक्रिया का काम शुरू कर दिया था। शिमला में कैबिनेट मिशन की बैठक इसी लिए बुलाई गई। ये बैठक 1946 की गर्मियों में हुई जिसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता मौजूद थे।
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कैबिनेट मिशन की बैठक में भारत को आजाद करने के ड्राफ्ट पर चर्चा हुई। साथ ही विभाजन की नींव भी इसी बैठक में पड़ी। एक बात पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। संशय इस बात पर है कि विभाजन के ड्राफ्ट पर वॉइसरीगल लॉज में हस्ताक्षर हुए थे या फिर एक दूसरी इमारत पीटरहॉफ में। हालांकि ये तय है कि ड्राफ्ट शिमला में ही डिस्कस और साइन हुआ।
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ये इमारत देश-विदेश के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र भी है। यहां स्थापित म्यूजियम में देश की आजादी व विभाजन से संबंधित फोटो रखे गए हैं। आजादी पर लिखी गई किताबें भी हैं। इस संस्थान की लाइब्रेरी में करीब 1.5 लाख किताबें मौजूद हैं। हर साल ये इमारत सैलानियों के आने से टिकट बिक्री के जरिए लाखों रुपयों की आमदनी करती है।