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September 14, 2026

हिमाचल: साइबर ठगों ने लूट लिया रिटायर अधिकारी, एक माह तक 'डिजिटल अरेस्ट' रखा; 33 लाख ठगे

मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसने का डर दिखाकर शातिरों ने लूटा रिटायर अधिकारी

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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश में साइबर ठगी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिसने डिजिटल अपराधियों के बढ़ते हौसले को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। हैरानी की बात यह है कि इस बार साइबर ठगों ने किसी अनजान या कम पढ़े लिखे शख्स को नहीं बल्कि एक रिटायर अधिकारी को अपना निशाना बनाया। शातिरों ने सेवानिवृत्त अधिकारी को मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसने का डर दिखा कर करीब एक महीने तक डिजिटल अरेस्ट रखा और 33 लाख रुपए ठग लिए। 64 वर्षीय पीड़ित शख्स कांगड़ा जिले की धीरा तहसील का रहने वाला है और एक सेवानिवृत्त अधिकारी है।

रिटायर्ड अधिकारी भी ठगों से नहीं बच पाया 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ठगों के निशाने पर कोई अनजान या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बड़े पद से सेवानिवृत्त अधिकारी आए। जिस तरह से शातिरों ने पुलिस, सीबीआई और दूरसंचार विभाग के नाम का इस्तेमाल करते हुए पूरा फर्जी तंत्र खड़ा किया, उससे पीड़ित लगातार दबाव में रहे। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब पुलिस और प्रशासन लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि फोन पर खुद को पुलिस, जज या सीबीआई अधिकारी बताकर धमकाने वालों से डरने की जरूरत नहीं है, तब भी साइबर अपराधी किस तरह अपने शिकार को मानसिक रूप से इस कदर घेर लेते हैं कि वह लाखों रुपये गंवा बैठता है।

 

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एक फोन कॉल से शुरू हुआ पूरा खेल

पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार 30 जुलाई को 64 वर्षीय व्यक्ति के पास एक फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली की एक दूरसंचार कंपनी का अधिकारी बताया और दावा किया कि पीड़ित के आधार कार्ड का इस्तेमाल कर आईसीआईसीआई बैंक में एक खाता खोला गया है। इस बैंक खाते के जरिए 6.8 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लेन-देन किया गया है। अचानक सामने आए इतने गंभीर आरोप ने पीड़ित को सकते में डाल दिया।

गिरफ्तारी वारंट की धमकी देकर डराया

इसके बाद कथित तौर पर एक दूसरे व्यक्ति ने खुद को आईपीएस अधिकारी बताया। उसने पीड़ित से कहा कि उनके नाम पर गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है। ठगों ने कहानी को विश्वसनीय बनाने के लिए यह भी दावा किया कि मामले को रफा-दफा करने के लिए एक अधिकारी ने 70 लाख रुपये कमीशन लिया है। इसके बाद कथित सीबीआई अधिकारी की भूमिका निभा रहे एक अन्य शातिर ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। उसने पीड़ित पर निगरानी रखने का नाटक किया और यहां तक कहा कि उनकी सुरक्षा के लिए दो लोगों को तैनात किया गया है।

 

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हर एक-दो घंटे में देनी पड़ती थी अपनी लोकेशन की जानकारी

ठगों ने बुजुर्ग को इस तरह मानसिक रूप से नियंत्रित कर लिया कि उनकी दिनचर्या तक पर निगरानी रखी जाने लगी। उन्हें निर्देश दिया गया कि हर एक-दो घंटे में अपनी जानकारी दें। घर से बाहर निकलने से पहले और वापस लौटने के तुरंत बाद ठगों को सूचना देने के लिए कहा गया।

बैंक खाते की जांच के नाम पर मांगी पूरी रकम

साइबर ठगों ने इसके बाद एक और चाल चली। उन्होंने बैंक खातों और मोबाइल फोन की जांच का हवाला देते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया पूरी करने के लिए उनकी रकम एक विशेष बैंक खाते में ट्रांसफर करनी होगी। ठगों ने पीड़ित को यह भरोसा दिलाया कि जांच पूरी होने के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा। लगातार बनाए गए मानसिक दबाव के बीच पीड़ित उनकी बातों में आ गए।

 

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दो किस्तों में भेज दिए 33 लाख रुपये

ठगों के दबाव में आकर पीड़ित ने आरटीजीएस के जरिए दो अलग-अलग तारीखों में रकम ट्रांसफर कर दी। 12 अगस्त को 4 लाख रुपये और फिर 20 अगस्त को 29 लाख रुपये कथित तौर पर ठगों के बताए खातों में भेजे गए। इस तरह कुल 33 लाख रुपये उनके हाथ से निकल गए।

28 अगस्त को अचानक बंद हो गए फोन और वीडियो कॉल

करीब एक महीने तक डर और मानसिक दबाव में रहने के बाद 28 अगस्त की सुबह अचानक ठगों के फोन और वीडियो कॉल आना बंद हो गए। लंबे समय से कथित अधिकारियों के निर्देशों का पालन कर रहे पीड़ित को जब संपर्क नहीं हुआ तो उन्हें शक हुआ। इसके बाद उन्हें समझ आया कि जिस पूरी कानूनी कार्रवाई से वह डर रहे थे, वह वास्तव में साइबर ठगों की बनाई हुई फर्जी कहानी थी और वह लाखों रुपये की ठगी का शिकार हो चुके हैं।

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पुलिस ने दर्ज की FIR, जांच शुरू

मामले की शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला में प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(डी) के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस अब ठगों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और लेन-देन समेत अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर रही है।

डिजिटल अरेस्ट असल में ठगों का डर पैदा करने वाला हथकंडा

साइबर ठगी के इस तरीके में अपराधी वीडियो कॉल या फोन के जरिए खुद को पुलिस, सीबीआई, अदालत, दूरसंचार विभाग या अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। इसके बाद पीड़ित को किसी अपराध में फंसाने, गिरफ्तारी वारंट या खाते में अवैध लेन-देन का डर दिखाया जाता है। इसके बाद पीड़ित को लगातार फोन पर रहने, वीडियो कॉल पर बने रहने, किसी से बात न करने और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसी तरह के दबाव को आम तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है।

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पुलिस ने दी साफ चेतावनी—फोन पर धमकी मिले तो घबराएं नहीं

एसपी कुलभूषण वर्मा ने लोगों से अपील की है कि फोन पर खुद को अधिकारी बताकर धमकाने वाले लोगों पर तुरंत भरोसा न करें। यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी जांच का डर दिखाकर पैसे मांगता है तो बेहद सतर्क रहें।

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