#अव्यवस्था
January 12, 2026
हिमाचल में एक और SCAM : जल शक्ति विभाग में करोड़ों की हेराफेरी, पाइपों के बनाए फर्जी बिल
जल शक्ति विभाग के मौजूदा सचिव ने झाड़ा पल्ला
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में एक और करोड़ों रुपये का गड़बड़झाला सामने आया है। इस बार यह हेराफेरी हिमाचल जल शक्ति विभाग में हुई है- जिसका खुलासा आधिकारिक दस्तावेजों में हुआ है।
दरअसल, जल शक्ति विभाग की स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई है। इस रिपोर्ट ने GI पाइप आपूर्ति से जुड़े ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं- जो सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संभावित मिलीभगत और दस्तावेजी हेराफेरी की ओर भी इशारा करते हैं।
मार्च 2025 के दौरान 4,500 मीट्रिक टन से अधिक GI पाइप की आपूर्ति में नियमों की खुली अवहेलना सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति प्रक्रिया में ई-वे बिल का इस्तेमाल तो दिखाया गया, लेकिन वास्तविक ट्रांसशिपमेंट को लेकर ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इससे आशंका गहराती है कि कागजों में सामग्री की आवाजाही दर्शाई गई- जबकि जमीनी स्तर पर नियमों का पालन नहीं हुआ।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान L-1 फर्म होने के आधार पर मैसर्स APL अपोलो टयूब्स लिमिटेड को 4,770 मीट्रिक टन GI पाइप की आपूर्ति का ऑर्डर दिया था।इस पूरी सप्लाई की अनुमानित लागत 36.77 करोड़ रुपये बताई गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस आपूर्ति में से 13.150 मीट्रिक टन GI पाइप को बिना प्रदेश नागरिक आपूर्ति निगम (सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन) के प्रतिनिधि को सूचित किए सीधे बड़सर डिवीजन भेज दिया गया। इस पाइप की कीमत करीब 10.19 लाख रुपये आंकी गई। यह सीधा-सीधा निविदा शर्तों का उल्लंघन माना जा रहा है।
मामले को और संदिग्ध बनाता है ट्रांसपोर्टेशन का विवरण। कंपनी की ओर से दावा किया गया कि एक ही ट्रक HR39F-7899 में आनी और बड़सर दोनों डिवीजनों के लिए सामग्री भेजी गई। दस्तावेजों में आनी के लिए 12.550 मीट्रिक टन और बड़सर के लिए 13.150 मीट्रिक टन सामग्री दर्शाई गई।
बाद में कंपनी ने सफाई दी कि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण ट्रक पूरी सामग्री लेकर आगे नहीं जा सका, इसलिए बड़सर डिवीजन की सामग्री को दूसरे ट्रक HP72B-0655 में ट्रांसशिप किया गया। मगर रिपोर्ट साफ तौर पर बताती है कि इस कथित ट्रांसशिपमेंट के दौरान न तो सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन के किसी प्रतिनिधि की मौजूदगी दर्ज है और न ही वीडियोग्राफी या तौल से जुड़े कोई प्रमाण प्रस्तुत किए गए।
स्क्रीनिंग कमेटी के सामने रखी गई रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि निविदा की शर्तों के अनुसार सामग्री की तौल, डिस्पैच और ट्रांसशिपमेंट की पूरी प्रक्रिया सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन के प्रतिनिधि की मौजूदगी में होनी चाहिए थी।
इसके अलावा पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी अनिवार्य थी, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन इस मामले में इन शर्तों का पालन नहीं किया गया। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि बिना निगरानी के हुई इस प्रक्रिया में न केवल मात्रा से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का खतरा भी सामने आता है।
साल 2025-26 के लिए गठित स्क्रीनिंग कमेटी की पहली बैठक 18 दिसंबर को डिप्टी CM मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में आयोजित की गई थी। बैठक में कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इसी बैठक में प्रस्तुत रिपोर्ट ने विभाग के भीतर चल रही कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जब इस पूरे मामले को लेकर जल शक्ति विभाग के मौजूदा सचिव अभिषेक जैन से सवाल किया गया- तो उन्होंने साफ तौर पर खुद को इससे अलग करते हुए कहा कि यह मामला उनके कार्यकाल का नहीं है।
उनका कहना था कि जिस विषय की उन्हें प्रत्यक्ष जानकारी नहीं है, उस पर वे कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। हालांकि, प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि जब रिपोर्ट आधिकारिक मंच पर रखी जा चुकी है, तो आगे की जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी।
स्क्रीनिंग कमेटी की रिपोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यह मामला केवल तकनीकी चूक तक सीमित नहीं है। नियमों की अनदेखी, दस्तावेजों की विसंगतियां और निगरानी के बिना हुआ ट्रांसशिपमेंट- ये सभी पहलू किसी गहरी जांच की मांग करते हैं। विदित रहे कि, हिमाचल में इससे पहले भी कई बड़े स्कैम सामने आ चुके हैं।