शिमला। देवभूमि हिमाचल की धार्मिक आस्था इसे विशेष बनाती है। हिमालय की इन पवित्र वादियों में ऐसा विश्वास है कि यहां का हर कण देवी-देवताओं की उपस्थिति से पवित्र है। ये देवता न केवल मंदिरों और पूजास्थलों में पूजे जाते हैं, बल्कि हर पर्वत, झरने और जंगल को उनका निवास स्थान माना जाता है।
हर गांव का अपना देवता
यहां के लोग देवी-देवताओं को अपनी संस्कृति और परंपराओं का आधार मानते हैं। हर गांव का अपना एक देवता होता है, जिसे "ग्राम देवता" कहा जाता है। इन देवताओं की प्रतिष्ठा इतनी गहरी है कि उनके सम्मान में विशेष समारोह और मेले आयोजित किए जाते हैं। लोग अपनी समस्याओं के समाधान और जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में देवताओं का मार्गदर्शन लेते हैं।
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चार रियासतों के राजा
आज हम आपको हिमाचल के एक ऐसे देवता साहिब के बारे में बताएंगे- जो चार रियासतों के राजा हैं और इन्होंने ही बिलासपुर-शिमला मार्ग पड़ने वाला दाड़लाघाट, कराड़ा घाट और दानो घाट बनाया था। फिर अंत में ये देवता महाराज असंख्य शक्तियों के साथ मंढोड़घाट में विराजित हुए।
14 रथ में विराजित हैं देवता
ये देवता साहिब एक साथ 14 रथों पर विराजित हैं। देवता साहिब के रथ यहां-यहां हैं-
- मंडी- 1 रथ
- धामी- 3 रथ
- बाघल- 5 रथ
- मशोबरा- 1 रथ
- सुन्नी- 3 रथ
- घनाहटी- 1 रथ
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पलभर में पूरी करते हैं इच्छा
हम बात कर रहे हैं भज्जी, धामी, सुकेत और बाघल रियासत के आराध्य देवता कुर्गण जी महाराज मंढोडघाट की- जो पल भर में भक्तों के मन की इच्छा पूरी करते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद देवता जी की जातर लगती है।
बताते हैं कि जब एक नर्तकी के श्राप से सिरमौर रियासत डूब गई थी तो राजा के बेटे चूड़धार के रास्ते जाखू मंदिर में तपस्या करने गए। जिसके बाद वे भज्जी रियासत में पहुंचे- जहां पर राजा के बेटे ने देवत्व को प्राप्त किया और देवता कुर्गण जी महाराज के नाम से विख्यात हो गए।
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निगल गए सिपाही की तलवार
वहीं, जब एक बार भज्जी रियासत के राजा दुर्गा सिंह के दरबार में कहलूर रियासत के सिपाही घुस आए और देवता कुर्गण महाराज के बाग में उत्पात मचाने लगे। देवता के गुर धनकलू उन्हें समझाने भी गए, लेकिन कहलूर के सैनिक उनसे भी उलझ गए। तभी देवता कुर्गण महाराज जी ने अपने गुर धनकलू में प्रवेश किया और वे कहलूरिये सिपाही की तलवार ही निगल गए।
देवता साहिब ने बनाए कई घाट
फिर ये बात सुनकर कहलूर के राजा विजाय चंद ने देवता जी को अपनी रियासत में बुलाया- जहां गुर धनकलू जी ने उस तलवार को बाहर उगलकर दिखा दिया जिससे प्रसन्न होकर राजा विजाय चंद ने देवता जी का साज-बाज बनाया। वापसी में जिस स्थान पर भी देवता रुके वहां उनके रूकने की व्यवस्था भी की। बताते हैं कि वापसी में देवता जी जिन स्थानों पर रुके थे, वहां घाट बनते गए- जिन्हें हम इन नामों से जानते हैं- दाड़लाघाट, कराड़ा घाट और दानो घाट।
