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August 13, 2025

हिमाचल के लाल को मिला था देश का पहला परमवीर चक्र, सरहद पर थरथर कांपते थे दुश्मन

पाकिस्तान से बचाया कश्मीर

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Somnath Sharma Paramveer Chakra

कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में जन्मे सोमनाथ शर्मा की कहानी हर भारतीय को गर्व से भर देती है। भारतीय सेना के अधिकारी सोमनाथ शर्मा ने देश की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया। उनकी जांबाजी की कहनी ये बताती है कि कैसे आखिरी सांस तक उन्होंने दुश्मन को भारतीय धरती से दूर रखा। चोटिल होने के बावजूद उन्होंने रणभूमि में जाने का फैसला लिया। आइए इस स्वतंत्र दिवस के मौके पर जानते हैं कहानी मेजर सोमनाथ शर्मा की।

दर्द में देशभक्ति का जज्बा

मेजर सोमनाथ शर्मा के एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था। हॉकी खेलते वक्त हाथ फ्रैक्चर हुआ पड़ा था। उन्हें आराम करने की सलाह दी गई थी लेकिन मेजर सोमनाथ की देशभक्ति कहां मानी। सोमनाथ जानते थे कि दुश्मन दरवाजे पर खड़ा है और ये वक्त दर्द या घाव देखने का नहीं है। मेजर ने जंग में जाने की अनुमति मांगी जो मान ली गई लेकिन ये कौन सी लड़ाई थी ? आइए जानते हैं।

 

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700 दुश्मनों के सामने 50

आजादी के चार महीनों बाद ही 3 नवंबर 1947 को पाकिस्तान ने श्रीनगर पर हमला कर दिया। पाकिस्तान इस हमले के जरिए श्रीनगर एयरबेस को कब्जे में करना चाहता था। दुश्मन की तरफ से 700 आदमी मैदान में थे जिन्हें भारतीय सेना के 50 जवानों ने 6 घंटे के लिए आगे बढ़ने से रोका। हमारे जवानों ने 200 दुश्मनों को मौत के घाट भी उतारा।  

शहीद हो गए मेजर शर्मा

दुश्मनों से लड़ते-लड़ते हमारे देश के 22 जवान शहीद हो गए। इसी दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा भी शहीद हो गए थे। बता दें कि मेजर सोमनाथ चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डेल्टा कंपनी के अधिकारी थे। पाकिस्तान की घुसपैठ के समय उन्हें श्रीनगर एयरबेस की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया। 22 अक्तूबर 1947 को सूचना मिलती है कि पाकिस्तान घुसपैठ करने वाला है।

 

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कश्मीर घाटी को है बचाना

23 अक्तूबर 1947 की सुबह सैनिकों और हथियारों को श्रीनगर पहुंचाया गया। 31 अक्टूबर को मेजर शर्मा भी श्रीनगर पहुंच गए। मेजर शर्मा को आला सैन्य अधिकारियों ने कहा कि कश्मीर घाटी को घुसपैठियों से बचाना है। 2 नवंबर 1947 को खबर आई कि पाकिस्तानी दुश्मन श्रीनगर एयरफील्ड से कुछ किलोमीटर दूर बडगाम तक पहुंच गया है। अधिकारी के आदेश पर मेजर शर्मा और 50 जवानों की कंपनी बडगाम के लिए रवाना हुई।

सही निकला शर्मा का अंदाजा

3 नवंबर 1947 की सुबह मेजर शर्मा और टीम बडगाम पहुंचे। टीम ने मोर्चा लेने के लिए पोजिशन ली। दुश्मन की हलचल दिख रही थी। मेजर शर्मा ने अंदाजा लगाया कि ये हलचल ध्यान भटकाने के लिए है। असली हमला तो पश्चिम से हो रहा है। मेजर का अंदाजा सही निकला। दोपहर ढाई बजे 700 लश्कर कबिलाइयों ने हमला कर दिया। सेना के जवान तीन तरफ से घिर गए थे लेकिन जवान लड़ते रहे।

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7 दुश्मनों से लड़ रहा 1 जवान

मेजर सोमनाथ को पता चला कि उनका हर 1 जवान 7 दुश्मनों से लड़ रहा है। उन्होंने और टुकड़ी भेजने की मांग की। शर्मा जानते थे कि बडगाम पोस्ट क्या वैल्यू रखती है। वो उस पोजिशन को छोड़ना नहीं चाहते थे। अगर ये पोस्ट हाथ से चली जाती तो शायद श्रीनगर भारत के हाथ से निकल जाता और कश्मीर घाटी भारत से अलग हो जाती लेकिन मेजर शर्मा और उनकी टीम ने ऐसा होने नहीं दिया।

प्लास्टर में भी डटे रहे मेजर शर्मा

मेजर शर्मा के एक हाथ में प्लास्टर लगा था लेकिन फिर भी वो हर पोस्ट पर दौड़-दौड़कर जवानों का हौसला बढ़ा रहे थे। दुश्मन बीच-बीच में गोलियां बरसा रहे थे। फॉरवर्ड प्लाटून खत्म हो चुकी थी। सैनिकों ने मेजर सोमनाथ के हौसले को देखते हुए जंग जारी रखी। इस बीच मेजर शर्मा गनर्स के पास मैगजीन पहुंचाने लगे ताकि किसी भी पोस्ट पर गोलियां खत्म ना हों।

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आखिरी सांस तक देते रहेंगे जवाब

इस सबके बीच मेजर शर्मा ने एक संदेश मुख्यालय भेजा। उन्होंने जानकारी दी कि वे बहुत कम संख्या में हैं। दुश्मन 45-46 मीटर दूर है। हम भयानक गोलीबारी के बीच हैं लेकिन हम एक इंच भी नहीं खिसकेंगे। आखिरी गोली और जवान तक दुश्मनों को जवाब देते रहेंगे। इससे थोड़ी देर बाद ही मेजर सोमनाथ शर्मा एक मोर्टार विस्फोट में शहीद हो गए।

सेना ने पेश की बहादुरी की मिसाल

अभी तक मेजर शर्मा की टुकड़ी के 20 से ज्यादा जवान शहीद हो चुके थे। फिर बाकी बचे जवानों ने मोर्चा संभाला और बहादुरी की मिसाल पेश की। दुश्मन को छह घंटे तक आगे नहीं बढ़ने दिया। रीइनफोर्समेंट के तौर पर कुमाऊं रेजीमेंट की बटालियन आई जिसने अपनी पोजिशन संभाली। इस सब में मेजर शर्मा, एक जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर और चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डी कंपनी के 20 सैनिक शहीद हो गए लेकिन श्रीनगर और कश्मीर बच गया।

 

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