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November 22, 2025

हिमाचल के बंदरों ने कभी हिला दी थी अंग्रेजों की हुकूमत, बने थे "स्ट्रीट सुपरस्टार"- जानें रोचक कहानी

महात्मा गांधी ने बजाया था विरोध का बिगुल

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Shimla Monkeys

शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला आज जिस तरह बंदरों की चंचलता, शरारत और कभी–कभार आक्रामक व्यवहार से जूझती है, वैसा ही हाल 80 साल पहले भी था। फर्क बस इतना है कि तब इस समस्या ने अंग्रेज़ी शासन को इतना परेशान कर दिया था कि सरकार ने इन्हें खत्म करने या विदेश भेजने जैसी बड़ी योजनाएँ तक बना डाली थीं।

ब्रिटिश शासन के लिए बने थे सिरदर्द

राष्ट्रीय अभिलेखागार में संरक्षित 1943 की गोपनीय फाइलें आज भी इस पूरे प्रकरण की गवाही देती हैं। ब्रिटिश हिल स्टेशन शिमला में उस समय बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ गई थी। मॉल रोड, ऑकलैंड हाउस, अपर बाज़ार और आसपास के इलाकों में इनकी हरकतें इतनी बढ़ चुकी थीं कि अधिकारी इसे “गंभीर प्रशासनिक समस्या” की तरह देखने लगे थे।

 

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इसी दौरान एक फाइल तैयार की गई जिसका शीर्षक था “Elimination of Monkeys from Shimla”। इस फाइल में दो बड़े प्रस्ताव रखे गए थे, पहला बंदरों को शूट कर मार देना और दूसरा बंदरों को पकड़कर जहाजों के माध्यम से विदेश भेज देना।

पहला प्रस्ताव धर्म भावनाओं से टकराया

जैसे ही बंदरों को मारने का प्रस्ताव सामने आया, तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन को पता चला कि हिंदू समाज में बंदर, विशेषकर हनुमान धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। ऐसी कार्रवाई से बड़े पैमाने पर रोष भड़कने का डर था। इसलिए यह प्रस्ताव फाइल में ही दफन हो गया और तुरंत रोक दिया गया। दूसरा प्रस्ताव था शिमला को ‘मंकी ट्रांज़िट कैंप’ बनाने की तैयारी जिसके तहत बंदरों को पकड़कर जहाजों में लादकर विदेश भेजना था।

 

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हालांकि, तैयारियाँ भी शुरू हो गई थीं। कई इलाकों में कैम्प लगाने, बंदरों को एकत्र करने और उन्हें अन्य देशों में भेजने के लिए प्रक्रिया तय की जा रही थी। अगर यह योजना लागू होती, तो इतिहास में शायद शिमला “मंकी एक्सपोर्ट ज़ोन” बनकर दर्ज होता।

महात्मा गांधी ने विरोध का बिगुल बजाया

मगर, यहीं पर पूरी कहानी मोड़ लेती है। महात्मा गांधी को जब यह खबर मिली, तो उन्होंने अपनी पत्रिका ‘हरिजन’ में इसका कड़ा विरोध दर्ज किया। महात्मा गांधी ने साफ लिखा कि, “बंदरों को विदेश भेजना अमानवीय है। एक भी बंदर बाहर नहीं भेजा जाएगा।” उनके इस विरोध के बाद अंग्रेज़ी सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ गया।

 

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80 साल बाद भी वही कहानी

दिलचस्प बात यह है कि समय बदला, सरकारें बदलीं, पर शिमला के बंदरों की कहानी आज भी जस की तस है। साल 2024 में केंद्र सरकार ने बंदरों को एक वर्ष के लिए ‘वर्मिन’ घोषित कर गैर वन क्षेत्रों में उन्हें नियंत्रित करने की अनुमति दी थी, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। शिमला आज भी इन बंदरों का शहर माना जाता है, जहां लोग इनसे कभी हंसते हैं, कभी डरते हैं और कभी हैरान रह जाते हैं कि इन शरारती “सुपरस्टारों” ने इतिहास में अंग्रेज़ों को भी नाच नचाया था।

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