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August 16, 2025
हिमाचल: पौंग बांध से छोड़े पानी ने मचाई तबाही, घर धराशायी; खेत-फसलें सब तबाह
अवैध खनन बन रहा तबाही का कारण, लोगों ने सख्ती की उठाई मांग
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कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर कांगड़ा जिले में हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं। बीते कुछ दिनों से रुक.रुक कर हो रही मूसलधार बारिश और पौंग डैम से छोड़े जा रहे पानी ने मंड भोग्रवां गांव सहित आसपास के कई इलाकों को तबाही के कगार पर पहुंचा दिया है। ब्यास नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से गांव की उपजाऊ जमीन, रिहायशी मकान और फसलें जलमग्न हो चुकी हैं।
मंड भोग्रवां गांव की स्थिति सबसे अधिक भयावह बन गई है, जहां बहती ब्यास नदी अब रिहायशी इलाकों को निगलने पर आमादा है। गांव का एक बहुमंजिला मकान आधा नदी में समा गया है, जबकि बाकी बचा हिस्सा भी कभी भी धराशायी हो सकता है। प्रशासन ने समय रहते इसे खाली तो करवा लिया, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह मंजर किसी त्रासदी से कम नहीं। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने जीवन भर की कमाई से यह घर बसाए थे। अब सब कुछ आंखों के सामने बहता जा रहा है।
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ग्रामीणों का आरोप है कि यह प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित तबाही है। उनका दावा है कि ब्यास नदी के किनारे वर्षों से अवैध खनन जारी है, जिसमें खनन माफिया भारी मशीनों से पत्थरों की संरचनाएं (कैरेट) डाल रहे हैं। इससे नदी का स्वाभाविक बहाव बदल गया है और अब उसका रुख गांवों और खेतों की ओर मुड़ गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खनन माफियाओं को कथित रूप से कुछ अधिकारियों और विभागों का संरक्षण प्राप्त है। यदि समय रहते इन गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया होता, तो आज यह दिन देखने को नहीं मिलता।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने अब तक कोई ठोस राहत नहीं दी है। कुछ अधिकारी जरूर प्रभावित इलाकों का दौरा कर चुके हैं, लेकिन न तो खाने.पीने की व्यवस्था की गई है और न ही अस्थायी आश्रय स्थलों की। एक स्थानीय महिला ने बताया कि हमारे पास अब न खाना है, न रहने की जगह। अधिकारी आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। हमें नहीं पता कि आगे क्या होगा।
हालांकि, कांगड़ा के उपायुक्त हेमराज बैरवा ने हाल ही में कहा कि जिला प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी। मगर जमीनी हकीकत इससे मेल नहीं खा रही।
मंड भोग्रवां के अलावा रियाली, मंड घंडरां, मंड सनौर और मंड मियाणी जैसे गांव भी ब्यास नदी की बाढ़ की चपेट में हैं। कई घर पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं, जबकि कुछ गांवों का संपर्क मुख्य सड़क मार्ग से कट गया है और वे टापू बन गए हैं। खेतों में लगी मक्का, धान और सब्जियों की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ है।
मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में और भी भारी बारिश की चेतावनी दी है, जिससे लोगों की चिंता और बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि 2023 की बाढ़ की त्रासदी अब भी उनके ज़ेहन में ताज़ा है, जब इसी तरह पौंग डैम से पानी छोड़े जाने के कारण दर्जनों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा था।
स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्यास नदी का वैज्ञानिक तरीके से चैनलाइजेशन किया जाए और अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई हो, तभी इस तरह की आपदाओं को रोका जा सकता है। एक ग्रामीण ने ग़मगीन स्वर में कहा कि हमने अपने बच्चों का भविष्य इन घरों में बसाया था। अब न घर हैं, न खेत। अगर यही हाल रहा, तो अगले साल शायद गांव भी न बचे।