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November 21, 2025
हिमाचल हाईकोर्ट का मां के हक में ऐतिहासिक फैसला, तीसरे बच्चे पर भी मैटरनिटी लीव मंजूर
मैटरनिटी लीव पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी क्षेत्र में कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला कर्मचारी के तीसरे बच्चे का जन्म विशेष परिस्थितियों में हो, तो वह भी मातृत्व अवकाश की हकदार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में महिला कर्मचारी को 12 हफ्तों (84 दिन) का अवकाश दिया जाना चाहिए। यह फैसला शिक्षा विभाग में कार्यरत एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सुनाया गया, जिसका आवेदन विभाग ने नियमों का हवाला देते हुए पहले ही खारिज कर दिया था।
प्रार्थी अनुराधा शर्मा, जो शिक्षा विभाग में TGT (कला) के पद पर कार्यरत हैं, ने अपने तीसरे बच्चे के जन्म पर मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन दिया था। विभाग ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद प्रार्थी ने न्याय की उम्मीद में हिमाचल हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट के समक्ष कर्मचारी महिला ने बताया कि उसकी पहली शादी 2005 में हुई थी। इस विवाह से 2007 और 2012 में दो बेटियां हुईं। विवाह जीवन में पति का व्यवहार क्रूर था और बाद में महिला का परित्याग कर दिया गया।
तलाक के बाद उसने दोनों बेटियों की परवरिश अकेले की। दूसरी संतान एक गंभीर तंत्रिका संबंधी बीमारी से पीड़ित है, जिसके कारण विशेष देखभाल आवश्यक रहती है। इन परिस्थितियों के बीच उसे पहली शादी के समय दोनों प्रसवों पर मातृत्व अवकाश मिल चुका था।
कुछ समय बाद प्रार्थी महिला की शादी एक ऐसे व्यक्ति से हुई जिसकी पहली पत्नी और इकलौती संतान एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अब यह दंपत्ति पहली बार माता-पिता बने और अगस्त 2024 में उनका एक बच्चा हुआ। यानी यह बच्चा दंपत्ति का पहला, लेकिन महिला का तीसरा जैविक बच्चा है।
हाईकोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ ने मामले की परिस्थितियों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद कहा याचिकाकर्ता तीसरे बच्चे के लिए भी विशेष परिस्थितियों में मैटरनिटी लीव की हकदार है। हालांकि, नियमों के अनुसार दो बच्चों पर 180 दिनों की पूरी मैटरनिटी लीव मिलती है, लेकिन तीसरे बच्चे के लिए 12 हफ्तों (84 दिन) का अवकाश देने का प्रावधान किया जा सकता है।
महिला को आवेदन की तारीख से 12 सप्ताह की लीव का लाभ मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला साधारण नहीं, बल्कि विशेष परिस्थितियों वाला है- जहां पहली शादी टूट गई, बच्चे महिला की अकेली ज़िम्मेदारी रहे और दूसरा विवाह एक नई शुरुआत थी।
विभाग ने कहा था कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश का अधिकार नहीं देता। नियमों के अनुसार केवल पहले दो बच्चों के लिए ही 180 दिन की लीव अधिकृत है।
वहीं, अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम कठोर नहीं हो सकते। मानवीय परिस्थितियों को देखते हुए विशेष मामलों में न्यायसंगत समाधान आवश्यक है। इसलिए तीसरे बच्चे के मामले में भी मातृत्व अवकाश दिया जा सकता है, भले ही अवधि सीमित (12 सप्ताह) ही क्यों न हो।
इस फैसले से न केवल याचिकाकर्ता को न्याय मिला है, बल्कि उन कई महिला कर्मचारियों को भी राहत मिलेगी- जिनका तीसरा बच्चा विशेष परिस्थितियों में हुआ हो। जैसे दूसरी शादी, विधवा विवाह, तलाक के बाद नया विवाह या चिकित्सकीय जटिलता वाले मामले। यह फैसला महिला कर्मचारी अधिकारों और मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।