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July 20, 2026

दूसरी पत्नी से सं.बंध अनैतिक नहीं... पेंशन मामले में हाईकोर्ट ने खारीज की सुक्खू सरकार की अपील

हाईकोर्ट ने कहा- आर्थिक रूप से कमजोर दूसरी पत्नी पारिवारिक पेंशन की हकदार

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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पहली पत्नी के जीवित रहते हुए किया गया दूसरा विवाह भले ही कानून की नजर में वैध न माना जाए, लेकिन ऐसे संबंधों को अनैतिक नहीं कहा जा सकता।

 

हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार को नसीहत देते हुए कहा कि यदि दूसरी पत्नी आर्थिक रूप से आश्रित है तो उसे केवल तकनीकी आधार पर पारिवारिक पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंदर नेगी की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को निरस्त करते हुए पूर्व में दिए गए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा।

पेंशन विवाद से जुड़ा था मामला

मामला उर्मिला देवी नामक महिला से जुड़ा हुआ था, जिनका विवाह 3 अप्रैल 1987 को एक सरकारी कर्मचारी के साथ हुआ था। हालांकि विवाह के समय उस कर्मचारी की पहली पत्नी जीवित थी, जिसके कारण यह विवाह हिंदू विवाह कानून के तहत वैध नहीं माना गया। इसके बावजूद उर्मिला देवी और सरकारी कर्मचारी लंबे समय तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहे। इस संबंध से उनके दो पुत्र भी हुए, जो अब वयस्क हो चुके हैं।

 

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पति की मृत्यु के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई

सरकारी कर्मचारी के निधन के बाद उर्मिला देवी ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया। लेकिन 18 फरवरी 2022 को संबंधित विभाग ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती, इसलिए पेंशन का लाभ भी नहीं दिया जा सकता। विभाग के इस निर्णय के खिलाफ उर्मिला देवी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद एकल पीठ ने उनके पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने उस आदेश को चुनौती देते हुए खंडपीठ में अपील दायर की थी।

 

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हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को नहीं माना

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों को केवल तकनीकी और कानूनी नजरिए से नहीं देखा जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरी शादी को भले ही कानून मान्यता न देता हो, लेकिन उससे बने पारिवारिक संबंधों को अनैतिक करार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब कोई महिला वर्षों तक वैवाहिक जीवन जीती है, परिवार का हिस्सा रहती है और आर्थिक रूप से पति पर निर्भर होती है, तो उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

खंडपीठ ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं तो ऐसे संबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि भारतीय समाज में ऐसे कई मामले मौजूद हैं जहां दूसरी शादी कानूनी रूप से मान्य नहीं होती, लेकिन उन संबंधों से जुड़े लोगों को सामाजिक और आर्थिक संरक्षण की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में न्यायालयों को संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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आर्थिक सुरक्षा भी है महिला सशक्तीकरण का हिस्सा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला सशक्तीकरण केवल नारों या योजनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सशक्तीकरण तब संभव है जब महिलाओं को आर्थिक रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि मृत कर्मचारी के बच्चों या अन्य वैध वारिसों को पेंशन दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, तो विभाग को केवल तकनीकी आधार पर बाधा नहीं डालनी चाहिए।

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सामाजिक न्याय की दिशा में अहम फैसला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, जो वर्षों तक वैवाहिक संबंध में रहने के बावजूद कानूनी जटिलताओं के कारण आर्थिक अधिकारों से वंचित रह जाती हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कानून की व्याख्या करते समय सामाजिक वास्तविकताओं और मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

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