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April 23, 2025
एक पन्ना पहलगाम : स्याह वादियां, टूटे ख्वाब और एक चुप्पी जो झकझोर गई
जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों की कायरना हरकत
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नितेश त्रिपाठी /नई दिल्ली- वे गए थे सुकून की तलाश में. वे गए थे वादियों को निहारने. वे गए थे स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को जीने. किसी के साथ पूरा परिवार था. कोई दोस्त संग गया था, कोई शादी के बाद प्यार के इजहार के लिए पहुंचा था. सबके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. मुस्कुराहट कश्मीर जाने की. मुस्कुराहट कश्मीर के पहलगाम जाकर उन पलों को जी लेने कि जो आने वाले वक़्त में हसीन हकीक़त बनकर तस्वीरों में कैद हो जाते. लेकिन किसे पता था कि जहां जीने गए हैं, वहां मौत खड़ी है, जहां मुस्कुराने गए हैं वहां से चीखें आएंगी. जहां चलकर गए हैं वहां से उठाकर लाए जाएंगे. जहां खिलखिलाने गए थे, वहां सन्नाटा पसर जाएगा. हर कोई सन्न रह जाएगा. देश स्तब्ध हो जाएगा.
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22 अप्रैल का वो मनहूस दिन जिसने कई परिवारों के चिराग बुझा दिए. जिसने कई परिवारों से हंसी की वजह छीन ली. जिसने ताउम्र सालते रहने वाला गम दे दिया. जिस दिन एक बाप ने अपने बेटे को खो दिया, एक नवविवाहित पत्नी के सामने उसका पति चल बसा और कई घरों के मुस्तकबिल फानी हो गए. 22 अप्रैल का दिन कुछ परिवारों को ही नहीं देश के सीने पर भी जख्म दे गया. आतंकी आए, हाथों में हथियार लिए, दिलो-दिमाग में नफरत पाले, जो खून को इबादत समझते हैं. जिनकी संवेदनाएं शून्य हो चुकी हैं, जिनके सीने में दिल नहीं, बारूद धड़कता है, जिन्हें इंसान की चीख सुनकर सुकून आता है, जो मासूमों के कत्ल के बाद जन्नत के ख्वाब देखते हैं. खून से जमीन रंगते हैं.
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आतंकियों ने लोगों का नाम पूछा, धर्म पूछा और गोलियां बरसा दीं. न कुछ सोचा, न समझा, न रुके, न दया दिखाई, न तरस आई. इस हमले में 26 बेकसूर लोगों की जान चली गई और दर्जनों घायल हो गए, वे घायल सिर्फ जिस्म से नहीं हुए, आत्मा से हो गए. आतंकी एक ऐसा जख्म दे गए, जिसकी गहराई इतनी ज्यादा है कि आने वाली कई पीढ़ियां इसे सहन नहीं कर पाएंगी.
आतंकियों ने नहीं सोचा कि एक पत्नी के सामने उसके पति को गोली मारी जा रही है. वो मासूम, असहाय, बेबस, लाचार खड़े हो कर देखती रह गई. कितना मुश्किल होता होगा अपनी नजरों के सामने अपनी सुहाग को उजड़ते देखना. ये कल्पना से परे है. ये दुख सभी दुखों पर भारी है, इस दर्द की कोई इंतहा नहीं.
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कहां तो कसम थी सात जन्मों तक साथ निभाने की और कहां मंगलसूत्र टूट गए. वो सपने बुन रही थी, ख्वाब सजा रही थी, ख्वाबों को हकीकत में बदलने पहलगाम गई थी और उसके हिस्से आईं सिसकियां, आंसू, गम, दर्द, चीखें और एक ऐसी चुप्पी जो इंसान के रूह को झकझोर दे.
क्या होगा उन घरों का जहां अब वीरानी छाई रहेगी. जहां मातम पसरा होगा. कितने माओं की गोद सूनी हो गई, कितने परिवार उजड़ गए. कसूर क्या था? एक ऐसी जगह जाना जहां हर किसी की ख्वाहिश होती है जाने की. लेकिन समय दिन और तारीख खिलाफ निकल गए.
आतंक का दंश देश बहुत पहले से झेल रहा है. घाव पर घाव. जख्म पर जख्म. एक घाव भरता नहीं कि दूसरा उभर आता है. लेकिन आखिर कब तक? कब तक देश के मासूम इन कायराना हमलों का शिकार होते रहेंगे? कब तक कायरता के प्रतीक, मानवता के दुश्मन हमारा सीना छलनी करते रहेंगे? कब तक हम लहूलुहान होते रहेंगे? क्या अब वक़्त नहीं आ गया है कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाए. अगर समय रहते आतंक पर कड़ा प्रहार नहीं किया गया तो आने वाले वक़्त में न जाने और कितने हमले देश सहेगा. आने वाली पीढ़ियों को हम क्या जवाब देंगे? फिर कहीं मोमबत्तियां जलेंगी, फिर कहीं संवेदनाएं उमड़ पड़ेंगी, लेकिन क्या मोमबत्तियों की वो रोशनी उन घरों की अंधेरों को मिटा पाएगी जहां से कोई चिराग बुझ गया है. पूरा देश इस वक़्त ग़मगीन है, हर आंख नम है, मातम है, शोक है, पीड़ा है.
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लेकिन देश इन नापाक मंसूबों से डरने वाला नहीं है. जहां बात देश की आए वहां हम एकजुट हैं, दुख में, संकट में, आंसुओं में. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह उन सभी आत्माओं को शांति दे जो खुद के भीतर का सुकून तलाशने पहलगाम गए और इस दुनिया से रुखसत हो गए. जो अब कभी नहीं आएंगे. लेकिन उनकी सदाएं आती रहेंगी. ईश्वर उनके परिवारों को वो हिम्मत दे जो इंसान होने के नाते किसी के लिए भी सहना असंभव है.