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August 24, 2026
हिमाचल का अनोखा शिव मंदिर : यहां नहीं चढ़ता पैसा, भक्त दान करते हैं घास- जानें मान्यता
देवभूमि का इकौलता ऐसा मंदिर- जहां नहीं कोई दान पात्र
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बिलासपुर। देवभूमि हिमाचल के जिला बिलासपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां श्रद्धालु भगवान शिव के दरबार में खाली हाथ नहीं आते। मगर उनके हाथों में न फूलों की बड़ी टोकरी होती है और न ही चढ़ावे के लिए पैसे। यहां आने वाले भक्त सिर पर घास का गट्ठर लेकर मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हैं।
कोई खेत से घास काटकर लाता है तो कोई दूर से चारे की गाड़ी लेकर पहुंचता है। यही घास भगवान को अर्पित की जाती है और फिर सीधे उन बेजुबान पशुओं तक पहुंचती है, जिनके लिए यह किसी प्रसाद से कम नहीं।
घुमारवीं तहसील के भगेड़ स्थित नंदेश्वर महादेव मंदिर की यही अनोखी परंपरा इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है। यहां शिवलिंग पर भांग, धतूरा या दूसरे पारंपरिक चढ़ावे के साथ घास भी अर्पित की जाती है। मंदिर परिसर में स्थापित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के सामने भी श्रद्धालु घास का चढ़ावा रखते हैं।
नंदेश्वर महादेव मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां दानपात्र नहीं रखा गया है। मंदिर के संस्थापक और समाजसेवी सुनील शर्मा का मानना है कि अगर श्रद्धालु भगवान के नाम पर धन देने के बजाय सीधे पशुओं के लिए चारा अर्पित करें तो उसका इस्तेमाल उसी काम में होगा, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
मंदिर में चढ़ने वाली घास को पूजा के बाद गौसेवा केंद्र में ले जाया जाता है। वहां मौजूद घायल और बेसहारा गौवंश को यही चारा खिलाया जाता है। इस तरह श्रद्धालुओं की आस्था सीधे जीव सेवा से जुड़ जाती है।

इस मंदिर और गौसेवा केंद्र की शुरुआत के पीछे भी एक भावुक कहानी है। बिलासपुर के कोसरियां गांव के रहने वाले सुनील शर्मा वर्ष 2009 में किसी काम से भगेड़ से गुजर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने सड़क किनारे एक घायल और बेसहारा गौवंश को देखा।
पशु की हालत देखकर उन्होंने उसकी देखभाल शुरू की। यही घटना उनके जीवन में बदलाव लेकर आई। उन्होंने घायल और बेसहारा पशुओं की सेवा का संकल्प लिया। उसी वर्ष प्रगति समाज सेवा समिति और नंदेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना कर इस सेवा कार्य को आगे बढ़ाया गया।
उस समय सुनील निजी कंपनी में नौकरी करते थे। नौकरी के साथ पशुओं की सेवा जारी रखी, लेकिन वर्ष 2014 में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना पूरा समय गौसेवा के लिए समर्पित कर दिया। इसी दौरान मंदिर में घास और चारा चढ़ाने की परंपरा शुरू की गई।
सुनील शर्मा ने लोगों से अपील की कि मंदिर में नकदी या दूसरी वस्तुएं चढ़ाने के बजाय पशुओं के लिए घास और चारा अर्पित करें। धीरे-धीरे लोगों ने इस पहल को स्वीकार करना शुरू कर दिया।

अब हालात यह हैं कि आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी घास लेकर मंदिर पहुंचते हैं। कई बार लोग घास से भरी पूरी गाड़ियां तक यहां छोड़ जाते हैं। मंदिर आने वाले लोगों के हाथों में फूलों के साथ घास का गट्ठर नजर आना अब इस जगह की पहचान बन चुका है। स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान शिव को घास अर्पित करने के साथ अगर किसी बेजुबान जीव का पेट भरता है तो इससे बड़ी सेवा और क्या हो सकती है।
मंदिर से जुड़े गौसेवा केंद्र में फिलहाल करीब 25 से 30 गौवंश की देखभाल की जा रही है। इनमें घायल, बीमार और बेसहारा पशु शामिल हैं। हल्के रूप से घायल पशुओं का उपचार वहीं किया जाता है, जबकि गंभीर स्थिति वाले पशुओं को सेवा केंद्र में लाकर इलाज और आश्रय दिया जाता है।
कुछ पशु ऐसे भी हैं जो कई वर्षों से इसी केंद्र में रह रहे हैं। गंभीर रूप से घायल पशुओं में कई बार उपचार के बावजूद जान नहीं बच पाती। मगर सेवा केंद्र की ओर से उन्हें अंतिम समय तक उपचार और देखभाल देने का प्रयास किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां चढ़ाया गया चारा वास्तव में जरूरतमंद पशुओं तक पहुंचता है, इसलिए श्रद्धालुओं का जुड़ाव लगातार बढ़ रहा है।
सुनील शर्मा के इस अभियान में उनका परिवार भी साथ खड़ा है। उनकी मां और बहनें भी सेवा कार्य में सहयोग करती हैं। उनका कहना है कि गौसेवा का यह काम किसी सरकारी आर्थिक सहायता के सहारे नहीं चल रहा, बल्कि समाज और श्रद्धालुओं के सहयोग से आगे बढ़ रहा है। मंदिर में आने वाला घास का हर गट्ठर इसी जनसहयोग की तस्वीर पेश करता है। किसी के लिए यह भगवान शिव का चढ़ावा है तो किसी के लिए घायल पशु के जीवन का सहारा।

सुनील शर्मा का कहना है कि प्रदेश में बेसहारा गौवंश की समस्या को लेकर सरकार को और गंभीरता से काम करने की जरूरत है। उनका सवाल है कि गौसेवा के नाम पर अलग-अलग माध्यमों से राशि जुटाए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर बेसहारा पशुओं की समस्या पूरी तरह क्यों नहीं सुलझ पा रही है। उनका कहना है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे घायल और बेसहारा पशुओं के उपचार, चारे और संरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों।
नंदेश्वर महादेव मंदिर की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि यहां आस्था का मतलब सिर्फ भगवान के सामने कुछ अर्पित करना नहीं है। यहां भक्त जो चढ़ाते हैं, वह पूजा के बाद सीधे किसी बेजुबान के पेट तक पहुंचता है। मंदिर की सीढ़ियों पर घास के गट्ठर लेकर चढ़ते श्रद्धालु मानो यह संदेश देते हैं कि भक्ति सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद जीव की सेवा में भी दिखाई दे सकती है।