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April 1, 2025

हिमाचल की वो देवी मां- जिनकी सिर्फ सतलुज के जल से ही होती है पूजा

क्रो के रूप में बाहर निकलकर निपटाती हैं बड़े-बड़े अनुष्ठान 

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Kusumba Bhavani Kushmanda Mata Ji

शिमला। देवभूमि हिमाचल में इन दिनों हर-तरफ नवरात्रि के पावन पर्व की रौनक दिखाई दे रही है। यह नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विशेष समय होता है। हर दिन मां के एक अलग रूप की आराधना की जाती है, जिससे भक्तों को शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सूर्य के तेज से जगत को करती है प्रकाशित

नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा की जाती है। इन्हें "सूर्य के तेज से जगत को प्रकाशित करने वाली देवी" माना जाता है। संस्कृत में "कूष्माण्ड" का अर्थ कुम्हड़ा (कद्दू) होता है और यह देवी अपने हल्के हास्य से ब्रह्मांड की रचना करने वाली मानी जाती हैं- इसलिए इन्हें यह नाम दिया गया है।

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नवरात्रि का चौथा दिन

आज के अपने इस लेख हम आपको बताएंगे कि नवरात्र के चौथे दिन हमारे हिमाचल की कौनसी देवी मां पूजी जाती हैं। इन देवी मां की मान्यता तीन रियासतों तक फैली हुई है। हम बात कर रहे हैं देवी मां कुष्मांडा स्वरूपा-कुसुंबा भवानी कुष्मांडा माता खेगसू जी की।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने किया स्थापित

बताते हैं ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने इन माता को कन्या रूप में रामपुर स्थित श्राईकोटी में शक्तियों समेत स्थापित किया था। मगर देवी मां को जब अपनी शक्तियों पर शंका हुई, तो वो फिर से तप करने लगीं। फिर एक दिन वहां समेधा ऋषि आए और मां आदि शक्ति के रूप को पहचाने बिना- वहीं पास में ही बैठकर खुद भी तप करने लगे।

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ऋषि को श्राप देकर बनाया कुत्ता

ऐसे में माता ऋषि समेधा की परीक्षा लेने के लिए सुन्दर कन्या रूप में प्रगट हुईं - मगर जैसे ही ऋषि की दृष्टि दूषित हुई, माता ने उन्हें श्राप देकर कुत्ता बना दिया।

 

जंगल में रोने लग पड़ीं

इसके बाद तपस्या करते हुए देवी मां 7 रूपों में विभाजित हुईं और 7 दिशाओं की ओर बढ़ चलीं। मगर जंगल में ही प्रगटे माता के 12 वर्षीय स्वरुप को ये नहीं समझ आया कि वो कहां जाएं- ऐसे में वो जंगल में ही रोने लग पड़ीं।

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तभी राजा के दो वजीर जंगल में आए और माता को बजीर कन्या समझ अपने साथ घर ले आए- जहां माता कई दिनों तक बिलकुल चुप रहीं और एक दिन अचानक लुप्त हो गईं। फिर जब वजीर को समझ आया कि वो बड़ी शक्ति हैं- तो फिर उसी गांव में उनका मंदिर बना।

सतलुज के पानी से होती है पूजा

मगर फिर माता ने पुजारी से कहा कि उनकी पूजा सिर्फ सतलुज के पानी से ही होगी - जिसके बाद उनके मंदिर को सतलुज किनारे खेगसू में शिफ्ट किया गया। जहां माता कुसुंबा भवानी आज भी विराजित हैं और क्रो के रूप में बाहर निकलकर बड़े-बड़े अनुष्ठान निपटाती हैं।

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